मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कहा कि जब कभी मन में ये भाव आये कि जिस समय मन में जो खाने का भाव आये वो मिलना चाहिए तो समझ लेना आपके जैन से शूकर बनने का बीजारोपण हो गया है। यदि उस समय निश्चित से आयु बन्ध होगा तो आप उसी ग्राम के शुकर बनोगे। इसलिए कभी स्वछंद नहीं होना। आपको धन चाहिए कहीं से भी आये, गर कभी ये भाव आये तो समझ लेना आपके भिखारी बनने का मौका आ गया है। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…
आगरा। जो कुछ भी नही जानना चाहता, फिर उसको सब कुछ जानने में आता है, उसे सर्वज्ञ कहते हैं। जिसको कुछ भी जानने में नहीं आता, लेकिन सब कुछ जानना चाहता है, उसे अज्ञ या अज्ञानी कहते हैं। जो कुछ नही करना चाहता और उसमें सब कुछ करने की शक्ति होती है, उसे भगवान कहते हैं,जो कुछ भी नहीं कर सकता है, सब कुछ करना चाहता है, उसे संसारी कहते हैं। जो सब कुछ देख सकता है और कुछ भी देखना नहीं चाहता है, उसे ईश्वर कहते हैं। जो सब कुछ सुन सकता है और कुछ भी नहीं सुनता, जो सब कुछ बोल सकता है और कुछ भी नही बोलता, जो सारी दुनिया को घूम सकता है लेकिन एक कदम भी नहीं उठाता, सारे तीन लोक को कम्पन कर सकता है लेकिन एक परमाणु को भी नहीं हिलाता, उसे भगवान कहते हैं, पूज्य, आराध्य,परमेष्ठी कहते हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन के दौरान कही। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत जो कुछ नहीं देखता, लेकिन सब कुछ देखने का भाव रखता है, जो कुछ भी नहीं बोलता लेकिन सब कुछ बोलने का भाव रखता है, उसे पापी-अज्ञानी कहते हैं। जैन दर्शन कहता है कि सबसे बड़ा पाप क्या है वो छोड़ो, जो न तुम कर रहे हो, न कर पा रहे हो, न जिंदगी में कर पाए हो। यदि कभी जिंदगी में क्रमबद्ध सुधरने का भाव हो तो ये भाव जरूर करना।99% लोगो का पतन इसलिए होता है क्योंकि वे चाहते हैं कि जो वे सोचें, वह संसार में हो।
पूर्व भवों की मिलती है सज
मुनि श्री ने कहा कि समवशरण जगह बहुत पवित्र होती है, इसमें अभव्यों का प्रवेश निषेध होता है, क्योंकि अभव्यों के प्रवेश से समवशरण की भूमि अपवित्र हो जाएगी। तुम समझ रहे हो कि मैं मन्दिर नहीं जा रहा हूं लेकिन धर्म कहता है कि रे पापी मैं तुझे मन्दिर में नहीं आने दूंगा, तेरे परिणाम बिगाड़ दूंगा, तुझे विपदा में डाल दूंगा, तुझे समस्या बता दूंगा, तू नहीं आ पायेगा। तेरे अभिषेक का भाव होगा ही नहीं, क्योंकि तेरे छूने से अभिषेक का लोटा अपवित्र हो जाएगा।तेरे जल डालने से मूर्ति की प्रतिष्ठा नष्ट हो जाएगी। मत सोचना कि मैं मन्दिर नहीं जाता हूं, नहीं मन्दिर तुझे रोक रहा है ये भाव है। कोई व्यक्ति गलत नहीं करना चाहता, कोई व्यक्ति अहितकारी कार्य नहीं करना चाहता, लेकिन एक बार तुमने अच्छे कार्य, अच्छे लोगों का मजाक उड़ाया था, सज्जन लोगों के प्रति बुरे भाव किये थे, तुरन्त चारित्र मोहनीय कर्म बंधा। कर्म कहता है कि इस पापी को अच्छे कार्य करने का मन न हो। जैन कुल में जन्मा है, इसको अभक्ष्य खाने का मन हो, भक्ष्य खाने का नहीं। इसको दिन में खाने का नहीं, रात में खाने का मन हो, ये धर्म -कर्म को कुछ नहीं माने, कोई क्रिया नहीं, कोई आचरण नहीं, कुल के विपरीत कार्य करे। शराब पीयेगा, जुआ खेलेगा कुछ नहीं ये तुम्हारी गलती नहीं है, ये धर्म का अतिशय है। क्योंकि पूर्व भव में जो तुमने धर्म और धर्मात्मा की हंसी उड़ाई थी,कर्म ने गिरफ्त में लेकर कहा, अब तेरे परिणाम ही नहीं होगे।
धर्म की कूटनीति को जानें
कर्म कहता है कहीं ये अच्छा न खा ले, कहीं ये व्रत न ले ले, नहीं तो मैं इसे नरक कैसे भेज पाऊंगा। सावधान महानुभाव जब जब आपका परिणाम ऐसा विपरीत हो रहा हो, समझ लेना कोई गलती हुई है। मेरे पास धन है, दान देने का भाव नहीं हो रहा, मैं जैन हूं फिर शराब न छूटे, फिर भी रात्रिभोजन न छूटे।सावधान ये तुम्हारी गलती नहीं है, ये धर्म की कूटनीति है। तुम इतने पापी हो चुके हो कि भगवान अपने मन्दिर के दरवाजे नहीं बुलाना चाहता। वो कहता है कि पापी की नजर मेरे ऊपर न पड़े। इस पापी के हाथ से मुनिराज की अंजुली में आहार न चला जाये, ये अभिशाप तुम्हें है। बस ऐसे मरीजों के लिए ही गुरु की जरूरत होती है। दुनिया का कोई भी अभिशाप हो, दिगम्बर मुनिराज के सामने आते ही वह अभिशाप खंडित हो जाता है। कभी तुम्हें ऐसा लगे कि मैं गलत मार्ग पर जा रहा हूं, मैं गलत जगह फंस रहा हूं, इसी का नाम है क्षयोपशम लब्धि। और विशुद्धि लब्धि में मैं ऐसा होने नही दूंगा, मैं नहीं पीऊंगा शराब,लेकिन अभी चलेगा नहीं मार्ग पर तो ज्ञान मना करने लगेगा, वो विचार करता है कोई मुझे जैसे बने बस बचा ले।
गर्भपात कराने वाले सबसे बड़े कसाई
कसाई दो काम करता है पशुओं को काटता और काटकर पेट भरता है लेकिन यहां माता-पिता दोनों डॉक्टर को सुपारी(फीस) देते हैं, अपने बच्चे की सुपारी देकर के उसके टुकड़े-टुकड़े कराते है और गर्भपात के टुकड़े कहां फेंक दिए जाते है नाली में। क्या ये कसाई है या उस कसाई से भी बड़े। ये घर -घर के बूचड़खाने कौन बंद कराएगा। इसे बड़ा पापी संसार में कौन होगा। शरण में आये हुए बालक के साथ ऐसा कौन करता है, तुमसे बड़ा कसाई नहीं है। सबसे बड़ा कसाई वह है जो दंपती होकर गर्भपात कराता है। जिंदगी भर पशुओं को मारकर खाने वाला माफी के योग्य है लेकिन अपने ही बच्चे को मां-बाप मिलकर के मरवाते हैं। यह कहीं भी माफी के योग्य नहीं है। जब कभी मन में ये भाव आये कि जिस समय मन में जो खाने का भाव आये वो मिलना चाहिए तो समझ लेना आपके जैन से शूकर बनने का बीजारोपण हो गया है। यदि उस समय निश्चित से आयु बन्ध होगा तो आप उसी ग्राम के शुकर बनोगे। इसलिए कभी स्वछंद नहीं होना। आपको धन चाहिए कहीं से भी आये, गर कभी ये भाव आये तो समझ लेना आपके भिखारी बनने का मौका आ गया है।













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