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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : इच्छा और तृष्णा से बचने की एक मात्र औषधि है संतोष – आर्यिका विभाश्री


वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि छोटे को देखकर जिओ क्योंकि छोटे को देखकर जीवन में सुख और शांति बनी रहेगी और बड़ों को देखकर बढ़ो, अच्छे के लिए हमेशा प्रयत्न करो और बुरे को सहन करने के लिए तैयार रहो। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जो संसार विषय सुख होता, तीर्थंकर क्यों त्यागे। जब संसार में सुख ही था, तो तीर्थंकर ने क्यों त्यागा। यद्यपि संसार में सुख नहीं है लेकिन हम जितने दुःखी हो रहे हैं, उतना दुख भी नहीं है। हम कैसे अपनी जीवन शैली को महान बनाएं, कैसे हम सुख और शांति के साथ अपने जीवन को जी सकें, कुछ महापुरुषों ने अपने जीवन का अनुभव और इसकी प्रेरणा दी है।

इन प्रेरणाओं को पाकर हम अपने जीवन को सुख-शांति से जी सकते हैं और अपने जीवन को महान बना सकते हैं। छोटे को देखकर जिओ क्योंकि छोटे को देखकर जीवन में सुख और शांति बनी रहेगी और बड़ों को देखकर बढ़ो, अच्छे के लिए हमेशा प्रयत्न करो और बुरे को सहन करने के लिए तैयार रहो, सबसे पहली बात है इंसान के जीवन की सबसे बड़ी समस्या है कि जब-जब उसने अपने से बड़ों को देखा, तब -तब वह असंतुष्ट और दुखी हो गया। उसे अपने दुख से ज्यादा दुसरे की सुख की चिंता होने लगी। नीति कहती है कि जिस दिन आप छोटों को देखकर जीना सीख जाओगे तो आप अपने आप सुखी हो जाओगे लेकिन जब-जब बड़ों को देखकर जिओगे, तब-तब आप महत्वाकांक्षाओं से भर जाओगे और असंतोष का जन्म होगा।

जैसे हो, वैसे होने में ही है सुख 

पू्ज्य माताश्री ने कहा कि जो काम सुई कर सकती है, वह काम तलवार नही कर सकती और जिस दिन आप छोटों को देखकर जिओगे तो खुद आप सुखी हो जाओगे और अगर हम अपने से नीचे वाले को देखते हैं तो लगता है कि हम सबसे सुखी हैं और हमारी चाहत यहीं तक है। सुख कहीं मिलेगा, इस भ्रांति का नाम संसार है। सुख अभी है, यहीं है, इस बोध का नाम निर्वाण है। सुख किसी से मिलेगा, इस भ्रांति का नाम संसार है। सुख अपना स्वभाव है, इस जागृति का नाम मोक्ष है।

सुख के लिए कोई परिस्थिति चाहिए, कोई शर्त पूरी करनी पड़ेगी, इस आपाधापी का नाम संसार है। सुख है ही, तुम जैसे हो वैसे होने में सुख है। सुख से तुम कभी च्युत ही नहीं हुए, सुख से ही तुम निर्मित हो। सुख को मांगने में भूल है, सुख को भोगने में सुख है। इस संसार में जितना मिला, उतना भोगा पर कभी तृप्ति नहीं मिली। यह संसार भी भला कभी तृप्त होने वाला है। संसार के साधनों के प्रति किया जाने वाला प्रेम ऐसा ही है, जिसे पाने के बाद और कुछ नया पाने की इच्छा उमड़ती है।

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