वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में जैन दर्शन के अनुसार संसार, कर्म, जन्म-मरण और वैराग्य का गहन विवेचन किया। उन्होंने कहा कि मिथ्यात्व, असंयम और योग ही संसार के मूल कारण हैं। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
सागवाड़ा/बांसवाड़ा (राजस्थान)। पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा से आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने जैन सिद्धांत के अनुसार संसार के स्वरूप, कर्म सिद्धांत, जन्म-मरण तथा वैराग्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संसरण करना ही संसार है और चतुर्गति में भ्रमण करने वाला जीव ही संसारी कहलाता है।
संसार का वास्तविक स्वरूप
धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने कहा कि सिद्ध भगवान लोक में विद्यमान हैं, किंतु संसार में नहीं हैं। संसार का संबंध जीव के अपने भावों से है, बाहरी परिस्थितियों से नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मिथ्यात्व, असंयम और योग जीव को संसार में बांधे रखते हैं।
कर्म और जन्म-मरण का संबंध
उन्होंने बताया कि आठ प्रकार के कर्मों से बंधे हुए नारकी, मनुष्य, तिर्यंच और देव आदि जीव संसार में भ्रमण करते हैं। जीव अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में है और गर्भ से लेकर मृत्यु तक अनेक प्रकार के दुःखों का अनुभव करता है। क्षायोपशमिक ज्ञान तीव्र न होने के कारण जीव अपने पूर्व जन्मों के सुख-दुःख को स्मरण नहीं रख पाता।
वैराग्य का आधार है सम्यक ज्ञान
धर्माचार्य ने कहा कि ज्ञान के बिना वैराग्य संभव नहीं है। जैन धर्म में जन्म-मरण, पाप, दुःख और कर्म का विस्तृत वर्णन इसलिए किया गया है ताकि जीव में वैराग्य उत्पन्न हो। उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों और महान संतों को वैराग्य भोग-विलास से नहीं, बल्कि संसार की वास्तविकता को समझने से प्राप्त हुआ।
मुनि सुविज्ञ सागर जी ने किया मंगलाचरण
कार्यक्रम के प्रारंभ में मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता—
“ना पक्षपात का भाव, ना तोड़-फोड़ का काम।
हे कनक नंदी का भाव, विश्व कल्याण का काम।”
—के साथ मंगलाचरण किया। कार्यक्रम की जानकारी सागवाड़ा निवासी विजयलक्ष्मी गोदावत ने प्रदान की।













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