नगर के चुंगी नाका स्थित श्री महावीर जिनालय में द्वितीय तीर्थंकर भगवान श्री अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया गया।अंबाह से पढ़िए, अजय जैन की यह खबर…
अंबाह। नगर के चुंगी नाका स्थित श्री महावीर जिनालय में द्वितीय तीर्थंकर भगवान श्री अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव अत्यंत श्रद्धा, उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंदिर परिसर में सुबह से ही धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला प्रारंभ हो गई थी, जिससे पूरा जिनालय भक्तिमय वातावरण में सराबोर नजर आया। इस दौरान जैन समाज के बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर के साक्षी बने। कार्यक्रम में प्रातःकाल में भगवान श्री अजितनाथ स्वामी की प्रतिमा का विधिवत अभिषेक किया गया। भगवान की प्रतिमा पर रजत एवं स्वर्ण कलशों से भव्य महा मस्तकाभिषेक हुआ। इस पुण्य अवसर का लाभ प्रथम चार पुण्यार्जक इन्द्रों को प्राप्त हुआ, जिन्होंने विधिपूर्वक अभिषेक किया। इसके पश्चात समाजजनों ने भी श्रद्धा और आस्था के साथ अभिषेक कर पुण्य अर्जित किया। मंदिर में विश्व शांति एवं सर्वकल्याण की भावना से वृहद शांति धारा का वाचन किया गया। श्रद्धालुओं ने एक स्वर में प्रार्थना करते हुए समस्त जीवों के कल्याण और शांति की कामना की। इस आयोजन का संचालन प्रवीण कुमार जैन (सेवानिवृत्त शिक्षक) एवं अश्वनी कुमार जैन (पुणे) के द्वारा संपन्न हुआ। आयोजन में शांतिनाथ विधान पंडित अंकित जैन (सिहोनिया) द्वारा विधि-विधानपूर्वक संपन्न कराया गया।
संयम, त्याग और साधना के माध्यम से आत्मिक उन्नति संभव
अपने प्रवचन में पंडित अंकित जैन ने कहा कि जैन धर्म में मोक्ष आत्मा की वह परम अवस्था है, जहां जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सिद्धशिला में स्थित हो जाता है। वहां आत्मा अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत ऊर्जा को प्राप्त करती है। यह स्थिति पूर्ण शांति और निर्विकारता की होती है, जहां न कोई दुख है और न ही कोई आसक्ति। उन्होंने बताया कि आत्मा पर चढ़े कर्म ही उसे संसार में बांधते हैं। जब तक मनुष्य राग, द्वेष, मोह और लोभ में उलझा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को अपनाकर ही मनुष्य कर्मों के बंधन को समाप्त कर सकता है और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है।उन्होंने आगे कहा कि पंच महाव्रत—अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—मोक्ष प्राप्ति के प्रमुख आधार हैं। इनका पालन करने से आत्मा शुद्ध होती है और धीरे-धीरे कर्म क्षीण होते जाते हैं। तीर्थंकरों का जीवन हमें यही सिखाता है कि संयम, त्याग और साधना के माध्यम से ही आत्मिक उन्नति संभव है।
भक्ति गीतों के माध्यम से भगवान की आराधना
विधान के पश्चात निर्वाण महोत्सव का पाठ किया गया। श्रद्धालु भक्ति में लीन होकर भजन-कीर्तन और नृत्य करते हुए भगवान श्रीजी के चरणों में निर्वाण लाडू अर्पित करते नजर आए। यह दृश्य अत्यंत भावपूर्ण और आध्यात्मिक अनुभूति से परिपूर्ण था। संगीतमय पूजन का आयोजन किया गया, जिसमें भक्तों ने भक्ति गीतों के माध्यम से भगवान की आराधना की। इस अवसर पर जैन समाज के दिगंबर जैन सोशल ग्रुप के अध्यक्ष संतोष जैन,महामंत्री विकास जैन पाड़े,कपिल जैन केपी, श्री कृष्ण जैन,राहुल जैन,अजय जैन बबलू, आशु जैन,मनीष जैन सहित वरिष्ठजन, महिलाएं, युवा एवं बच्चे बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।













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