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तुम दूसरे को दुआ दोगे तो तुम्हे भी दुआ लगेगी : मुनि श्री सुधासागर जी महाराज: धर्म सभा में मुनि श्री ने जीवन शैली पर डाला प्रकाश


निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर महाराज ने अपने धर्म प्रबोधन में जैन धर्मानुयायियों को उपदेश दिए। साथ ही उन्हें धर्म के मूल स्वरूप से परिचित करवाते हुए प्रेरणादायी विचारों से धन्य-धन्य किया। पढ़िए यह खबर…


सागर. प्रत्येक वस्तु अपना एक स्वतंत्र अहमियत रखती है, जिसे शास्त्री भाषा में धर्म बोलते हैं, कार्तिकेय अनुप्रेक्षा के इस सूत्र से सारे विकल्प खत्म हो जाते है। एक स्वभाव रूप धर्म होता है, एक साधन रूप धर्म होता है, एक साध्य रूप धर्म होता है और एक मजबूरी का धर्म होता है। अपन मजबूरी वाले धर्म मे जीते है और वो तो धर्म है ही नही। आप 24 घण्टे में जो कुछ भी करते हैं, मजबूरी में कर रहे है, जो भी आप सोच रहे हैं आप सोचने को मजबूर हैं क्योंकि आपकी हर क्रिया प्रतिकार है। संसार में जितने भी सुख है, यह सुख नहीं प्रतिकार है और जिस चीज का प्रतिकार करना पड़ता है, उसका नाम मजबूरी का धर्म है। सुबह से उठकर आपको फ्रेश जाना पड़ता है ये मजबूरी है, आप पेस्ट करते है, ये भी मजबूरी है अन्यथा मुख बदबू आती है। हर वस्तु पर तुमने अपनी वासना निमज्जित कर दी है कि ये मेरे लिए है, कभी ये भाव नहीं आता कि मैं भी दुनिया के लिए हूं। सारी दुनिया तुम्हारे लायक है, भगवान, गुरु, मां-बाप, धन, परिवार सब तुम्हारे लायक है और तुम किसी के लायक हो या नही, ये सबसे बड़ी भूल है। सुबह उठकर यह भाव करना है- मेरे पास जो है, क्या यह किसी के काम आ सकता है। तुम्हारे पास मन है तो क्या यह मन किसी के काम आ सकता है। मैं तपस्वी नहीं हूं, लेकिन मेरा मन जरूर एक काम में आ सकता है, मैं संसार को सुखी करने की भावना कर सकता हूं, यह भावना बहुत बड़ी ताकत है। डॉक्टर दवाई देता है तो वह बाद में काम करती है या बहुत कम काम करती है। सबसे बड़ी ताकत दुनिया में है, जो भावना करता है सब निरोग हो। जो बीमारी सारी दुनिया से ठीक नहीं होती है, वो बीमारी भावना से ठीक हो जाती है। तुम सारी दुनिया में शक्तियां ढूंढ रहे हो और एक शक्ति तुम्हारे पास है, जो तुम्हे बचा सकती है, जो तुम्हें अमीर बन सकती है, ज्ञानी, भगवान बना सकती है। वो शक्ति तुम्हारे पास है। जिस चीज से तुम परेशान हो, जिस चीज से तुम्हारी बीमारी है, बस एक पुण्य करके जाना कि भगवन मेरी एक प्रार्थना है कि जो बीमारी मुझे है मेरे बाद संसार में किसी को न हो।

सारे जगत के कल्याण की हो भावना

सारे जगत के कल्याण की भावना करो इसका नाम है दुआ, दूसरे की दुआ लेना नहीं है दूसरे को दुआ देना है। दूसरे की दुआ फलीभूत हो या न हो लेकिन, तुम दूसरे को दुआ दोगे तो तुम्हारे लिए दुआ जरूर लगेगी, ये कर्म का सिद्धांत है। लायक बनाओ मन को, मेरा मन लायक है। कुछ नहीं कर सकता तो संसार को सुखी बनाने की भावना तो कर सकता है। जो कुछ हुआ है स्वयं की भूल से हुआ है और जो कुछ होगा अपनी भूल सुधारने से होगा, इसलिए मजबरी की नही परोपकार की जिंदगी जिओ।

मन की शक्ति बड़ी है

आज से शुरू करो तुम्हारा मन किसी के लायक, किस रूप में है, यह मन की शक्ति बढ़ जाएगी, यह मन का क्षयोपशम बढ़ जाएगा, वह इतना ताकतवान हो जाएगा कि कितनी भी बुरी स्थिति आएंगी तुम्हें कभी घबराहट नहीं होगी। आग में भी कूदोगे तुम्हें डर नहीं लगेगा। जो कुछ भी तुम्हारे पास है उन सबमें लायकी देखो, दूसरे में मत देखो कि ये मेरे किस लायक है।

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