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भगवान की भक्ति, आराधना एवं विशुद्ध आचरण से दुर्लभ से दुर्लभ वस्तु भी सुलभता से प्राप्त हो जाती है : आर्यिका विभाश्री ने प्रभु की भक्ति की महिमा का किया बखान 


वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन के माध्यम से प्रभु की भक्ति की महिमा का व्याख्यान किया | जब मेरा मन और तन पवित्र होगा तब हम भगवान की आराधना कर पायेगें । संसार की कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो हमें भगवान की आराधना से प्राप्त न हो। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…


रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन के माध्यम से प्रभु की भक्ति की महिमा का व्याख्यान किया | जब मेरा मन और तन पवित्र होगा तब हम भगवान की आराधना कर पायेगें । संसार की कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो हमें भगवान की आराधना से प्राप्त न हो। जब हमें भगवान की भक्ति की महिमा का अहसास होता है। तब हमें भगवान के प्रति श्रद्धा बढ़ती है । संसार के सभी प्रकार के दुःख , कष्ट , संकट , परेशानियाँ भगवान की भक्ति से नष्ट हो जाते हैं ,और संसार के सभी सुख , मानसिक सुख , शारीरिक सुख एवं सभी प्रकार की सिद्धियाँ हमें भगवान की आराधना से प्राप्त होती हैं। यदि माता-पिता अच्छे हैं, तो उनके बच्चो में भी अच्छे ही संस्कार आएंगे। यदि माता-पिता के संस्कार अच्छे नहीं हैं तो उनके बच्चे भी संस्कार विहीन होंगे।

बच्चों का भविष्य माता-पिता के हाथ में

बच्चों का भविष्य माता-पिता के हाथ में होता है। वह चाहे तो श्रवण कुमार बना दें चाहे तो रावण हर मां अपने बच्चे को श्रवण कुमार बनाना चाहती है, लेकिन अपने पति को श्रवण कुमार बनते नहीं देखना चाहती। क्योंकि उसमें वह संस्कार नहीं है। इसलिए बच्चो में वह संस्कार डालें, जिससे वह धर्म के मार्ग पर चलकर अपनो के साथ दूसरों का सम्मान करें। प्रसिद्ध जैन स्तोत्र भक्तामर की महिमा के लिए कहा कि यह एक ऐसा स्तोत्र है जिसको प्रत्येक मां को अपने बेटे को जरूर पढ़ाना चाहिए । भक्तामर स्तोत्र का एक – एक अक्षर अपने आप में संपूर्ण मंत्र है । इस भक्तामर स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करने से हमारी सब विघ्न बाधायें दूर हो जाती है । भक्तामर का घर में पाठ करने से हमारे घर की शुद्धि होती हैं तथा घर में यदि भूत – प्रेत की बाधा हो तो भी दूर हो जाती है तथा हमारी सारी मनोकामनाओं को पूरा करने वाला भी यह भक्तामर स्तोत्र का पाठ है। प्रातः काल उठते ही प्रभु का नाम, प्रभु की पूजा करना चाहिए । जिनकी आप आराधना करते हो वह वीतरागी होना चाहिए, जो राग द्वेष से रहित हो ऐसे वीतरागी की आराधना से हमें धर्म का मार्ग प्रशस्त होता है।

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