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प्राचीन जिनालयों,संस्कृति,जिनवाणी का संरक्षण हो :  आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने समाजजनों को सौंपी जिम्मेदारी दिलाए संकल्प


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का रविवार को पाटोदी लश्कर मंदिर से भट्टारक जी की नसिया के लिए संघ सहित मंगल विहार हुआ। देश के सुप्रसिद्ध भामाशाह अशोक पाटनी किशनगढ़ ने विवेक काला के प्रतिष्ठान पर चरण प्रक्षालन किए। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


 जयपुर । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का रविवार को पाटोदी लश्कर मंदिर से भट्टारक जी की नसिया के लिए संघ सहित मंगल विहार हुआ। देश के सुप्रसिद्ध भामाशाह अशोक पाटनी किशनगढ़ ने विवेक काला के प्रतिष्ठान पर चरण प्रक्षालन किए। अशोक पाटनी नंगे पैर जैन ध्वज लेकर आचार्य श्री के साथ चले। धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उपदेश में कहा कि प्राचीन मंदिरों में संस्कृति होती है। प्राचीन ग्रंथ होते हैं।जयपुर राणा जी के नसिया से संघ का प्रवेश हुआ। चूलगिरी से भट्टारक जी की नसिया आते-आते अनेक प्राचीन जिनालयों प्राचीन दुर्लभ जिनवाणी के संघ ने दर्शन , किए ।नई-नई कॉलोनी में नए मंदिर बन जाते हैं किंतु सभी को प्राचीन मंदिरों के नियमित दर्शन करना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा कि देश में नगरों की सभी धार्मिक ,सामाजिक संस्थाओं को जैन संस्कृति जिनवाणी के संरक्षण प्रचार प्रसार के लिए समर्पित होकर धर्म का ऋण चुकाने के लिए संगठित होने की आवश्यकता है।

भगवान के उपदेशों को जीवन में ग्रहण करें

प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने जयपुर में भी काफी धर्म का बीजारोपण किया है। उनकी प्रतिमा महावीर विद्यालय एवं भट्टारक जी की नसिया में लगाने की प्रेरणा दी ।जिनालयों जिनवाणी का संरक्षण संगठित होकर जयपुर नगर देश में आदर्श प्रस्तुत करें। खुद की प्रभावना के बजाय श्रद्धा,भक्ति, समर्पण से भगवान के उपदेशों को जीवन में ग्रहण अपना कर धर्म के प्रचार प्रसार से धर्म प्रभावना कर मनुष्य जीवन ,जैन कुल को सार्थक करें यह मंगल धर्म देशना 76 वर्षीय वात्सल्य वारिधी 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने वर्षों बाद भट्टारक जी की नसिया प्रवेश के अवसर पर आयोजित धर्म सभा में प्रकट की। इसके पूर्व महावीर विद्यालय में आशीर्वचन में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया किजैन विद्यालय में संस्कार रूपी बीज से जीवन का निर्माण होता है हमने भी सनावद में महावीर पाठशाला में अध्ययन से संस्कार प्राप्त कर आज इस संयम मार्ग पर है। महावीर स्वामी अंतिम तीर्थंकर होकर उन्होंने धर्म तीर्थ का प्रवर्तन किया। उनका अनुसरण कर अनेक पंच परमेष्ठी हुए हैं। जिसमें हम भी शामिल हैं।

गौरवशाली आध्यात्मिक संस्कारों का बीजारोपण

विश्व को भगवान महावीर के सिद्धांतों की जरूरत है त्याग से जीवन उन्नत होता है प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ने तीर्थंकरों के मार्ग का अनुसरण कर संन्यास धारण किया। उन्होंने जयपुर प्रवास में गौरवशाली आध्यात्मिक संस्कारों का बीजारोपण किया। वर्तमान श्रमण परंपरा उन्हीं की बदौलत है। श्री महावीर स्वामी के संदेशों, उपदेशों को प्रत्येक कक्षा में लगाने का भी सुझाव दिया। श्री महावीर जी कमेटी के सुधांशु कासलीवाल, सुरेश सबलावत, हेमंत सोगानी, रुपिन काला, चंद्र प्रकाश जैन, उमराव मल ने बताया कि शोभायात्रा में जगह-जगह आचार्य श्री की आरती की गई। मंच संचालन कमल बाबू एवं मनीष वेद ने किया।

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