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प्रीति देव, शास्त्र, गुरु, धर्म से करें परिजनों जैसी प्रीति : पुण्य से सब कार्य सिद्ध होते हैं – आचार्य श्री वर्धमान सागर जी


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि संसार में प्रत्येक प्राणी को जैसे लौकिक परिजनों से प्रीति होती है, ठीक वैसी प्रीति देव, शास्त्र, गुरु, धर्म से भी होनी चाहिए। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…


उदयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज संघ सहित बीसा हूमड़ धर्मशाला में संघ सहित विराजित हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि संसार में प्रत्येक प्राणी को जैसे लौकिक परिजनों से प्रीति होती है, ठीक वैसी प्रीति देव, शास्त्र, गुरु, धर्म से भी होनी चाहिए। लौकिक प्रीति का फल हमारे संसार उपार्जन परिभ्रमण का कारण है। वस्तुत आपको वीतरागी, सर्वज्ञ, हितोपदेशी भगवान, धर्म से प्रीति करनी चाहिए। यह मंगल देशना आचार्य शिरोमणी वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने उदयपुर की धर्म सभा में प्रगट की।

मनुष्य पर्याय में धर्म से मिलेगा सुख

ब्रह्मचारी गजू भैया, पारस चितौड़ा, राजेश पंचोलिया इंदौर के अनुसार, आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि जो आत्मा का हित चाहते हैं, आत्मा का कल्याण चाहते हैं, उनकी धर्म से प्रीति होती है। धर्म से प्रीति करने से आत्मा जो है, संसार के दुखों से मुक्त होकर के ऐसे शाश्वत सुख को प्राप्त करती है, जहां कभी दुख होता ही नही है। तिर्यंच और मनुष्य पर्याय ऐसी है, जहां पर सुख भी होता है।

भेंट की जिनवाणी

आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मंगलाचरण पश्चात अतिथियों द्वारा आचार्य श्री शांति सागर जी एवं पूर्वाचार्यों के चित्र का अनावरण कर दीप प्रवज्वलन किया। पुण्यार्जक परिवार द्वारा पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की गई। संचालन प्रकाश सिंघवी ने किया।

गुरु है कल्पवृक्ष

आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व संघस्थ मुनि श्री हितेंद्र सागर जी का प्रवचन हुआ। प्रवचन में उन्होंने तिलक, देव पूजा के पुण्य और समाज की एकता पर बल देते हुए बताया कि पुत्र मोह में कैकयी माता ने वैरागी भरत को संन्यास से दूर करने के लिए राज्याभिषेक करवाया। श्रावक को देव पूजा, स्वाध्याय, संयम, तप दान द्वारा पुण्य उपार्जन का प्रयास करना चाहिए। कथा के माध्यम से बताया कि पुण्य नहीं होने पर रत्न कोयला बन जाता है और पुण्य होने पर सर्प पुष्पमाला बन जाती है। अरिहंत देव अपने समान सब को बनाने के लिए उपदेश देते हैं। आप अष्ट कर्मों का नाश कर अनंत सुख सिद्धालय को प्राप्त कर सकते हैं। गुरु पारस रूपी रत्न है जो मनुष्य को कंकर से शंकर बना देते हैं, गुरु कामधेनु गाय है, गुरु कल्प वृक्ष है। प्रभु भक्ति के प्रभाव से धनंजय कवि का मृत पुत्र जीवित हो गया। मुनि श्री ने अनेक प्रकार के तिलक का वर्णन और तिलक लगाने का महत्व प्रतिपादित किया कि जिनेंद्र भगवान के दर्शन कर उनके अंगूठे पर तिलक लगाकर वही तिलक मस्तक पर धारण करना चाहिए। तिलक जिनत्व की पहचान है।

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