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धर्म और आत्मा का असली स्पर्श तब होता है, जब मनुष्य भीतर से बदलने को तैयार होता है : चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से न जाए – आचार्य विनिश्चयसागर


रामगंजमंडी में आयोजित जैन धर्मसभा में आचार्य श्री विनिश्चयसागर जी ने मनुष्य के आचरण और मूल्यों को केंद्र में रखकर संयम और सच्चाई की महत्ता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि चोरी केवल वस्तु की नहीं, बल्कि नीयत की भी होती है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


रामगंजमंडी में आयोजित एक भावपूर्ण जैन धर्मसभा में बक्केशरी आचार्य श्री 108 विनिश्चयसागर जी महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि “चोर चोरी से जा सकता है, पर हेराफेरी से नहीं।” यह कथन केवल सांसारिक आचरण को ही नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई तक जाने वाला मार्गदर्शन है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जब किसी बुराई का आदी हो जाता है, तो उसे छोड़ना कठिन होता है। आदतें संस्कार बन जाती हैं, और संस्कार ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि बुरे संस्कार जीवन में बने रहें, तो चाहे कितना भी धार्मिक आडंबर किया जाए, आत्मा पवित्र नहीं हो सकती।

आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा, “कोई व्यक्ति चोरी करना तो छोड़ देता है, लेकिन लेन-देन में बेईमानी करता है। यही हेराफेरी है।” उन्होंने श्रावकों से आग्रह किया कि वे केवल बाह्य धर्म में नहीं, बल्कि अंतरात्मा की सच्चाई में विश्वास रखें। उन्होंने संयम, सत्य और ब्रह्मचर्य को जीवन का मूल स्तंभ बताया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने संयमित जीवन की प्रेरणा लेकर आशीर्वाद प्राप्त किया।

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