देबारी पार्श्वनाथ में आयोजित धर्मसभा में गणिनी आर्यिका श्री सुभूषणमति माताजी ने बच्चों को सुविधाओं के साथ समय देने, जिनेंद्र भक्ति अपनाने तथा करियर के साथ संस्कृति और संस्कारों को भी जीवन में महत्व देने का प्रेरक संदेश दिया। पढ़िए श्रीफल साथी अजीत कोठिया डडूका की यह रिपोर्ट।
देबारी। देबारी पार्श्वनाथ में ससंघ विराजमान गुरु परंपरा गौरव, आगमिक प्रखर वक्ता एवं चर्या शिरोमणि गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषणमति माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जिस प्रकार स्वस्थ शरीर के लिए सभी पोषक तत्व आवश्यक होते हैं, उसी प्रकार स्वस्थ विचार, श्रेष्ठ आचरण और सकारात्मक चिंतन के लिए आध्यात्मिक संस्कार आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि जीवन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व जिनेंद्र भक्ति है।
बच्चों को समय देना सबसे बड़ा संस्कार
आर्यिका माताजी ने कहा कि आज माता-पिता बच्चों को हर सुविधा तो उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन उनके साथ समय नहीं बिता पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल भौतिक सुख-सुविधाएं ही नहीं, बल्कि संस्कार, स्नेह और परिवार का समय भी मिलना चाहिए। यही उनके उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी है।
करियर के साथ संस्कृति भी जरूरी
उन्होंने कहा कि करियर बनाना आवश्यक है, लेकिन उसके लिए अपनी संस्कृति और मूल्यों को नहीं खोना चाहिए। अच्छे विचार, अच्छी वाणी और श्रेष्ठ चिंतन बाजार में नहीं मिलते, बल्कि परिवार, गुरु और धर्म से प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि विचार स्वस्थ होंगे तो जीवन भी स्वस्थ बनेगा।
पुण्य की पूंजी बढ़ाने का आह्वान
माताजी ने कहा कि मनुष्य जन्म और जैन कुल की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है। इसलिए इस अवसर का सदुपयोग करते हुए अधिक से अधिक पुण्य अर्जित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाप का त्याग विवेकपूर्वक करना चाहिए तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए पुण्य की पूंजी में निरंतर वृद्धि करनी चाहिए।
गुरु और जिनवाणी का बताया महत्व
धर्मसभा में माताजी ने गुरु और जिनवाणी की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि माता जीवन देती है, लेकिन जिनवाणी आत्मज्ञान का मार्ग दिखाती है और गुरु उस ज्ञान को जीवन में उतारना सिखाते हैं। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से जिनवाणी के अध्ययन और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा बनाए रखने का आह्वान किया।
जानकारी दी
कार्यक्रम की जानकारी अंजली जैन, हथौली (मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश) ने दी।













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