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मित्र आइने की तरह है, हमेशा सच्चा ईमानदार मित्र बनाओ: ज्ञान गंगा महोत्सव का समापन


पांच दिवसीय ज्ञान गंगा महोत्सव के आखिरी दिन प्रवचन सभा को आचार्य श्री पुलक सागर जी ने संबोधित किया। उन्होंने मित्रतापूर्ण व्यवहार पर जोर दिया। वे धरियावद से विहार कर नंदनवन पहुंचे। धरियावद से पढ़िए, श्रीफल साथी अशोक कुमार जेतावत की खबर…


धरियावद। गृहस्थ के जीवन में तीन चीजों का बड़ा महत्व होता है। पहला- पत्नी, दूसरा- बच्चे और तीसरा दोस्त इन तीनों के बगैर जिंदगी बेकार होती है। अच्छी पत्नी किस्मत से मिलती है, संतान प्रकृति की देन है। मगर मित्र बनाने में ना नसीब काम करता है, ना प्रकृति का हाथ होता है। यह सब मनुष्य खुद बनाया करता है। उक्त विचार राष्ट्रसंत दिगंबर जैनाचार्य प्रखर वक्ता आचार्य श्री पुलक सागर जी महाराज ने चंद्रप्रभ उद्यान परिसर के आनंद सभागार में मंगलवार को पांच दिवसीय ज्ञान गंगा महोत्सव के आखिरी दिन प्रवचन सभा में व्यक्त किए।

आचार्य श्री ने कहा कि मित्र वह होता है, जिससे हमारे विचार मिलते हैं। मित्र का चयन हमेशा सोच समझकर करना चाहिए। पत्नी अगर अच्छी मिल जाती है तो 60 प्रतिशत दुखों से बचा सकती है। वह गृहलक्ष्मी होती है, जो घर को संवारती है। लेकिन जीवन में अगर मित्र अच्छा मिल जाता है, तो वह 80 प्रतिशत तक दुखों को दूर कर सकता है। अगर दोस्त बुरा मिल जाता है, तो सात जन्मों का रिश्ता बिगड़ जाता है। संसार में सबकुछ मिल जाए पर मित्र नहीं मिले तो जीवन बेकार है।

खुद ही वफादार मित्र बन जाया करें

आचार्य श्री ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मित्रता का रिश्ता होना चाहिए। अगर ऐसा हो गया तो निश्चित रूप से दांपत्य जीवन सुखी हो जाता है। पत्नी जीवन साथी कहलाती है और उम्र भर साथ देती है। पत्नी से भी आपस में दो बोल प्रेम के बोल देने चाहिए, कभी-कभार पत्नी की भी प्रशंसा कर देनी चाहिए। इससे जीवन का सफर आसान हो जाता है। मित्रता में आनंद है। प्राणी मात्र से मित्रता का व्यवहार रखेंगे तो जीवन आनंद से भर जाएगा। आचार्य श्री पुलक सागर जी महाराज ने कहा कि वफादार मित्र की तलाश मत करिए। खुद ही वफादार मित्र बन जाया करें। फेसबुक पर हजारों मित्र बनाने से अच्छा है, एक ईमानदार मित्र बनाएं। पड़ोसी को मित्र बनाएं। आज पड़ोसी दुश्मन पालते हैं और फेसबुक पर मित्र बनाते हैं।

बिगड़े हुए हैं, वही गलत दोस्ती करते हैं

आचार्य श्री ने आगे कहा कि अच्छा मित्र आइने की तरह होता है। आइना जैसा हम करते हैं। वैसा ही दिखलाता है। उसी तरह सच्चा मित्र भी वही करता है। जो बिगड़े हुए हैं, वही गलत दोस्ती करते हैं। जो सुधरे हुए हैं वे गलत दोस्ती नहीं करते हैं। महाभारत काल में दुशासन ने परिवार की कुलवधू द्रौपदी का चीरहरण किया था क्योंकि, वह स्वयं बिगड़ा हुआ था।

आचार्य श्री ने नंदन वन में प्रवेश किया

प्रातःकालीन प्रवचन सभा में प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जैन ने परिवार सहित आचार्य संघ से श्री क्षेत्र सिद्धांत तीर्थ संस्थान नंदनवन और कन्या महाविद्यालय हिमवन क्षेत्र में पधारने की विनती की। हंसमुख जैन प्रतिष्ठा पितामह और मूर्धन्य विद्वान के रूप में देश भर में प्रसिद्ध हैं। वह खुद एक शिक्षाविद हैं और समंतभद्र शिक्षण संस्थान के संस्थापक एवं संचालक भी हैं। आचार्य श्री ने उनके निवेदन को स्वीकार करते हुए मंगलवार शाम को धरियावद से नगर से विहार कर नंदन वन में प्रवेश किया। यहां हंसमुख जैन, पत्नी अंजना देवी सहित समंतभद्र परिवार ने आचार्य श्री की अगुवानी की।

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