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मुनिश्री अनंतकीर्ति जी का 108वां सल्लेखना समाधि दिवस : मुरैना 20वीं सदी की प्रथम संल्लेखना समाधि स्थली


वर्तमान में पूज्य श्री की समाधि श्री दिगम्बर जैन महावीर नसिया जी जैन मंदिर, श्री पार्श्वनाथ जिनालय और श्री नंदीश्वर द्वीप जिनालय स्थापित है। वसंत पंचमी शुक्रवार को मुनि श्री अनंतकीर्ति जी महाराज का 108वां समाधि दिवस है। ऐसे दृण साधक के चरणों में कोटि कोटि नमन, वंदन। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट…


मुरैना। चंबल अंचल की पावन पवित्र वसुंधरा संस्कारधानी, धर्मनगरी मुरैना को 20वीं सदी की प्रथम संल्लेखना समाधि स्थली होने का गौरव प्राप्त है। आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व अंग्रेजों के शासन काल में दिगंबर मुनियों के दर्शन बहुत दुर्लभ थे। यदा-कदा दक्षिण भारत में ही कहीं कहीं गुफाओं और मठों में मुनिराज के दर्शन हो पाते थे। तत्कालीन विद्वानों ने अपने भजनों में, कवित्तों में इस बात का वर्णन किया है कि ऐसे दिगंबर साधु जो दिन में एक वार भोजन करते हैं, नग्न रहते हैं, पदभ्रमण करते हैं, परिषहों को सहन करते हैं, ऐसे दुर्लभ निग्रंथ वीतरागी साधुओं के दर्शन होना परम सौभाग्य की बात है। ऐसे साधुओं के दर्शन कब प्राप्त होंगे। उन विषम परिस्थतियों में लगभग 100 वर्ष पूर्व शिखर जी की यात्रा के उपरांत आगरा होते हुए मुनि श्री अनंतकीर्ति जी महाराज विद्याध्ययन के लिए मुरैना आए। उनका उत्तर भारत के तीर्थक्षेत्र की यात्रा का प्रथम प्रवास था। उस समय मुरैना का श्री गोपाल दिगंबर जैन सिद्धांत संस्कृत विद्यालय देश का सबसे ख्याति प्राप्त विद्यालय था। मुनि श्री समाज को धर्म ध्यान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान कर स्वयं आत्मध्यान और विद्यालय में अध्ययनरत रहते थे। पं. नन्हेलाल जी शास्त्री ने मुनि महाराज से व्रत नियम स्वीकार कर उनसे संयम पथ पर चलने का अनुभव प्राप्त किया। पं. जगमोहन लाल जी शास्त्री समय-समय पर प्रवचनों में उनके जीवन की घटनाओं का वर्णन करते थे।

माघ सुदी पंचमी को देह का त्याग मुक्तिधाम चले गए

मुरैना जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी अनूप भंडारी ने बताया कि मुनि श्री अनंतकीर्तिजी महाराज का जन्म सन 1940 में कर्नाटक प्रांत कारकल के निकट निलस्कर गांव में हुआ था। उन्होंने भट्टारक स्वामी से दीक्षा ग्रहण की और शिखर जी की यात्रा कर हिंदी भाषा सीखने एवं ज्ञानार्जन के लिये मुरैना आए। किंतु 30 दिन के प्रवास के पश्चात माघ माह में शीतलहर का प्रकोप बढ़ गया था। उस समय रात्रि काल में मुनिश्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर मुरैना के प्रांगण में एक पत्थर (पटिया) पर रात्रि विश्राम कर रहे थे। सर्दी का समय था, तब एक श्रावक ने वैयावृति के भाव से उस पत्थर की शिला के पास एक सिगड़ी में कोयले जलाकर रख दिए। मुनिश्री एक करवट में विश्राम करते थे, सिगड़ी के कोयले रात को धधकने लगे, जिससे पत्थर इतना गरम हो गया कि मुनिश्री के पैर का कुछ हिस्सा जल गया। मुनिश्री ने न तो पैर हटाया और न ही करवट बदली। उन्होंने पूर्ण परिषह सहन किया। उन्होंने किसी भी तरह की अग्रेंजी दवाइयों का तनिक भी उपयोग नहीं किया। एक श्रावक ने घी में जड़ीबूटी मिलकर मल्हम बनाकर महाराज श्री के पैर पर लगा दी किंतु, एक दिन मक्खी के चिपककर मर जाने से मुनिश्री ने उस मलहम का भी त्याग कर दिया और दृढ़ता पूर्वक संल्लेखना समाधि धारण कर माघ सुदी पंचमी विक्रम संवत 1974 को इस नश्वर देह का त्याग कर मुक्तिधाम की ओर चले गए।

समाधि स्थल पर एक भव्य नसियाजी का निर्माण 

मुनिश्री ने 20 दिनों तक कठिन परिषह सहन किया। उन्होंने 19 दिन तक खड़े न हो पाने के कारण आहार जल आदि नहीं लिया। 20 वें दिन खड़े होकर मात्र जल लिया था। उसी रात्रि के अंतिम पहर में उस वेदना को परिषह के रुप में सहन करते हुए दृढ़ता पूर्वक संल्लेखना का पालन करते हुए नश्वर शरीर को त्याग दिया। मुनिश्री की अंत्येष्टी फाटक बाहर मुरैना में की गई। जिसे आज श्री महावीर दिगंबर जैन नसियाजी मुरैना के नाम से जाना जाता है। समाधि स्थल पर एक भव्य नसियाजी का निर्माण हुआ।

मुनिश्री अनंतकीर्ति दिग.जैन ग्रंथमाला की स्थापना 

पूज्य मुनिराज अनंतकीर्ति जी महाराज की स्मृति को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए गोठ अंबाह निवासी बोहरे खुशहालीराम जैसवाल जैन द्वारा एक चरण छत्री का निर्माण कराया गया। जो आज भी एक भव्य रूप में स्थापित है और मुनिराज की जीवन गाथा का प्रमाण भी है। मुनिश्री अनंतकीर्ति महाराज की पुण्य स्मृति में मुंबई में मुनिश्री अनंतकीर्ति दिग.जैन ग्रंथमाला की स्थापना भी की गई थी। वर्तमान में पूज्य श्री की समाधि श्री दिगम्बर जैन महावीर नसिया जी जैन मंदिर, श्री पार्श्वनाथ जिनालय और श्री नंदीश्वर द्वीप जिनालय स्थापित है। वसंत पंचमी शुक्रवार को मुनि श्री अनंतकीर्ति जी महाराज का 108वां समाधि दिवस है। ऐसे दृण साधक के चरणों में कोटि कोटि नमन, वंदन।

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