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पुण्य संस्कार देने वाले माता-पिता को कभी नाराज़ न करें: मुनि श्री प्रणुत सागर जी ने माता-पिता के जीवन में महत्व की व्याख्या की 


सुख देने वाले पुण्य को और संस्कार देने वाले माता पिता को कभी नाराज़ नहीं करना जिस माता-पिता ने आपको जन्म दिया वो ही आपके दुःख में आपके पास खड़े रहते हैं और आज बच्चे माता-पिता को भूलते जा रहे हैं। यह उदगार दिगंबर जैन मंदिर में मुनिश्री प्रणुत सागर जी ने विभिन्न विषयों के प्रवचनों की श्रृंखला में धर्मसभा में व्यक्त किए। धामनोद से पढ़िए, दीपक प्रधान की यह खबर…


धामनोद। सुख देने वाले पुण्य को और संस्कार देने वाले माता पिता को कभी नाराज़ नहीं करना जिस माता-पिता ने आपको जन्म दिया वो ही आपके दुःख में आपके पास खड़े रहते हैं और आज बच्चे माता-पिता को भूलते जा रहे हैं। यह उदगार दिगंबर जैन मंदिर में मुनिश्री प्रणुत सागर जी ने विभिन्न विषयों के प्रवचनों की श्रृंखला में धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिराज ने कहा कि माता-पिता का महत्व क्या है? उनसे पूछो जिन्होंने अपने माता-पिता को खोया है। मुनिश्री ने कहा कि जिन बच्चों ने बचपन में छोटे-छोटे हाथों से गाय को रोटी दी है वो ही बेटा आज अपने जन्मदिन पर गौशाला में जाकर गाय को रोटी और चारा खिला रहा है। आप जब छोटे थे तब आपको हाथ पकड़ कर चलना उन्हीं ने सिखाया नहीं तो आपकी चाल टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती। आप आज भाग्यशाली हैं कि जिनेंद्र भगवान के दर्शन, अभिषेक, पूजन कर भगवान को छू पा रहे हैं क्योंकि, आपको आपके माता-पिता बचपन में हाथ पकड़कर जिनेंद्र भगवान के दर्शन के लिए लाए हैं और आज आप जिनवाणी का श्रवण कर रहे हो।

माता-पिता ने कभी नफरत नहीं की 

आप जब छोटे थे और जब आपकी नाक बहती थी तब आपके पिता ने अपने रुमाल से साफ कर अपनी जेब में रख लिया क्योंकि, आप सुंदर दिखें। आप जब छोटे थे तब आपने मां के पास सोते सयम गद्दा गिला कर दिया पर आपकी मां ही थी जिसने खुद गीले में सोना पसंद किया और तुम्हें सूखे में सुलाया। यदि ऐसा समय आ जाए अपने माता-पिता का वृद्ध अवस्था में बिस्तर पकड़ लें तो उनसे घृणा या नफरत नहीं करना क्योंकि, तुम जब छोटे थे तब तुमने भी उनके भोजन करते समय छींक, उल्टी या और गंदगी की पर उन्होंने कभी नफरत ना करते हुए भोजन और कार्य छोड़कर तुम्हंे साफ किया क्योंकि, उनका बेटा या बेटी साफ सुंदर रहे।

मां-बाप ने तुम्हें बचपन में राजकुमार की तरह रखा

माता-पिता ने तुम्हें बचपन में राजकुमार की तरह रखा। उनके बूढ़े होने पर तुम उनको महाराजा जैसा रखना तो ही तुम्हारी पूजा, पाठ, स्वाध्याय जप सार्थक है। यदि आप माता-पिता को कोसते हो नाराज़ करते हो और मंदिर में भगवान को पूजते हो तो तुम्हारी सारी पूजा व्यर्थ है क्योंकि, तीर्थंकर भगवान और मुनिराज भी बचपन में वैराग्य के समय अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर ही उनकी चरण वंदना करके ही दीक्षा लेते हैं। उनके सामने चारण ऋद्धि धारी मुनिराज आ जाए तब भी वे माता-पिता को सबसे पहले प्रणाम करते हैं। आज के समय में जिन माता-पिता ने आपको ये सुंदर शरीर, जीवन, संस्कार दिए वे ही आपके प्यार को तरस रहे हैं।

माता-पिता का ऋण तो कोई भी नहीं चुका सकता 

आज की पीढ़ी माता-पिता से झल्लाकर चिढ़कर बात करती है।यदि आप प्रेम से पांच मिनट बैठ कर अपने माता-पिता से बात कर ले तो वे खुश हो जाते हैं, उन्हें पूरे जीवन की खुशी मिल जाती है। आप आज जो भी कर रहे हो सब मां बाप की ही देन है। आपको बचपन में मां बाप ने जो सुविधाएं उपलब्ध कराई, जिसको की वो वहन नहीं कर सकते थे फिर भी आपको दी तो उन्हें आप को अब ब्याज सहित लौटाना चाहिए। आप को कभी पैसों की आवश्यकता पड़ी तो मां ने अपने पास जोड़-जोड़ कर रखे पैसे तुम्हें दिए ताकि तुम खुश रहो। माता-पिता का ऋण तो आप कोई भी इस जीवन में नहीं चुका सकता।

सजल नयनों से सुने प्रवचन 

सभी का ये कर्तव्य है कि माता-पिता को कभी नाराज़ नहीं करना, उनसे प्रेम से बात करना और वो क्या चाहते हैं, उनकी बात को पूरा सुनना। मुनिराज के मार्मिक प्रवचन से कई लोगों की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। उसके पूर्व मंदिर में भगवान के अभिषेक शांतिधारा संपन्न हुई। मंगलाचरण सुनीता प्रमोद जैन ने किया।

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