आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के मंगल सान्निध्य में सहस्त्रनाम विधान का आरंभ हुआ, जिसमें भगवान के 1008 दिव्य गुणों का गुणानुवाद एवं अध्र्य समर्पण श्रद्धा के साथ संपन्न हुआ। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…
टोंक। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शांति सागर जी महाराज की अविरल मूल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सान्निध्य में सहस्त्र महा मंडल विधान का शुभारंभ मंगलाचारण से हुआ। मंगलाचरण के दौरान भगवान के स्वयंभू, अचिंत्य, त्रिभुवन नाथ, अनंतजित, मृत्युंजय, त्रिनेत्र, अर्धनारीश्वर, वृषभ, ईशान, ज्ञानीअनंत आदि अनंत गुणों को भावपूर्ण स्मरण किया गया।
पंडित अनिल के निर्देशन में प्रारंभ हुए इस विधान में पारस मल लोकेश फूलेता परिवार ने ध्वजारोहण किया। सौधर्म इंद्र श्री कजोड़मल पारस मल बगड़ी ने मुख्य धार्मिक क्रिया निष्पादित की। विभिन्न इंद्र — कुबेर इंद्र श्री नंदलाल-संजय संघी, ईशान इंद्र श्री रामपाल-विष्णु कुमार लाम्बा, सनत इंद्र श्री प्रदीप कुमार संदीप तथा कई श्रेष्ठियों ने प्रमुख अध्र्य समर्पित किए।
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि सहस्त्र महा मंडल विधान में भगवान के 1008 दिव्य नामों का स्मरण एवं गुणानुवाद किया जाता है, जिनके पूजन से पाप कर्मों का क्षय होता है। मूल नायक श्री पार्श्वनाथ भगवान की पूजन के बाद दोनें वलयों में 25 एवं 100 अध्र्य समर्पित कर विधान की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। आचार्य श्री एवं मुनि श्री हितेंद्र सागर जी द्वारा मंत्रोच्चार किया गया।
आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन का सौभाग्य श्री रमेश चंद चंद्रप्रकाश परिवार को प्राप्त हुआ। आयोजकों ने इसे पूर्णतः दिव्य एवं दुर्लभ आध्यात्मिक साधना बताया।













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