दिवाली का त्योहार नजदीक है। रविवार को धनतेरस का पर्व है। इसके मद्देनजर दीपमालिकाएं लगाने के लिए पारंपरिक मिट्टी के दीपक लगाने की अपील काव्यात्मक अंदाज में प्रस्तुत की है डडूका के अजीत कोठिया ने, आज पढ़िए, उनकी यह कविता…
आओ दीप जलाए,
दिवाली मनाए।
खुशियां बिखराए
मेरिए सजाए।
गन्ने के डंडे में तेल दीप जला
पारंपरिक दिवाली मनाए।
पशुओं को रामजी लगाए,
बुजुर्गों को धोक लगाए।
खील बताशे सजाए
रंग बिरंगी दिवाली मनाए।
लक्ष्मी पूजन, बही पूजन द्वारा
समृद्धि बढ़ाए, परंपराएं निभाए।
दिवाली आणा करा
नवदंपत्तियों को आशीर्वाद
दिलो से दिलाए।
प्रेम रस से सराबोर दिवाली
घर घर पहुंचाए।
घरों में बहु रंगोली सजाए
सुख समृद्धि के मार्ग
पुष्पित पल्लवित कराए।
माउवे फाफ्टे घी लगा खाए
दादा दादी के जमाने की
पारंपरिक दिवाली की यादें ताज़ा कराए
आओ नव दिवाली मनाए,
जाति पाती, पंथ, धर्म का भेद मिटा
सबको गले लगाए













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