टोंक में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सान्निध्य में प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी महोत्सव का दो दिवसीय कार्यक्रम भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
टोंक। राजकीय अतिथि पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के ससंघ सान्निध्य में टोंक अतिशय क्षेत्र में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आचार्य पद प्रतिष्ठापना शताब्दी का दो दिवसीय महोत्सव 3 और 4 अक्टूबर 2025 को बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ।
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में कहा कि प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी के गुण — सरलता, सत्य व्यवहार, धर्म के प्रति अनुराग, त्याग और समता — को वाणी से प्रकट करना अत्यंत कठिन है। उन्होंने कहा कि आचार्य पद की प्राप्ति योग्यता और आत्मबल के आधार पर होती है। 20वीं सदी के इस प्रथमाचार्य ने आत्मा के ज्ञान को प्रकट कर धर्म मार्ग को आलोकित किया।
गुरुभक्त राजेश पंचोलिया के अनुसार, आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि दीक्षा के साथ जीवन का उत्थान होता है और अहिंसा का पालन मन, वचन, और काय से किया जाना चाहिए। वाणी की कटुता भी हिंसा का रूप है। आचार्य श्री ने सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, और सम्यक चारित्र को जीवन में धारण कर जिनागम परंपरा को जीवंत किया।
आचार्य श्री का जीवन सादगी, त्याग और धर्मनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण
उन्होंने बताया कि जैन साधु अपने तप, संयम और शौर्य से कर्म रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। आचार्य श्री शांतिसागर जी का जीवन सादगी, त्याग और धर्मनिष्ठा का अद्भुत उदाहरण था। उनकी प्रेरणा से ही मुलाचार ग्रंथ का प्रकाशन हुआ, और जैन समाज को नई दिशा मिली।
महोत्सव के समापन अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने संघपति जवेरी परिवार मुंबई, चंदू काका बारामती परिवार, डॉक्टर कल्याण गंगवाल, अरविंद दोषी, पंडित हंसमुख शास्त्री, और टोंक समाज के समस्त सदस्यों को आशीर्वाद प्रदान किया।
आचार्य श्री के करकमलों से चित्र अनावरण, दीप प्रवज्जलन, चरण प्रक्षालन और जिनवाणी भेंट जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। समाज के 100 सदस्यों ने देव-शास्त्र और आचार्य श्री समक्ष राष्ट्र सेवा, श्रुत जिनवाणी सेवा, श्रमण सेवा, एवं जैन विवाह प्रकल्पों के लिए संकल्प लिया। कार्यक्रम में शामिल गुरु भक्तों का स्वागत तिलक, माला, शाल और श्रीफल से किया गया। समापन पर आचार्य श्री ने समता, संयम और सेवा की भावना को जीवन में अपनाने का संदेश दिया और कहा — “धर्म ही जीवन की सर्वोच्च साधना है।”













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