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आचार्य विनिश्चय सागर जी के सानिध्य में राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ : जैन दर्शन के अनमोल रत्नों ने आगमोदय ग्रंथ पर किया विमर्श


रामगंजमंडी स्थित सिद्ध क्षेत्र में आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में दो दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। देशभर से आए विद्वानों ने आचार्य श्री द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर अपने विचार प्रस्तुत किए और जैन दर्शन की गहराइयों पर चर्चा की। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की रिपोर्ट…


रामगंजमंडी। परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज के सानिध्य में राष्ट्रीय स्तर की दो दिवसीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन कर मंगलाचरण किया गया। विद्वत जनों ने श्रीफल समर्पित कर आचार्य श्री के चरणों में वंदन किया और मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

समारोह में धवला षट्खंडागम ग्रंथ (रजत पत्र पर निर्मित) की स्थापना समाज अध्यक्ष दिलीप विनायका, उपाध्यक्ष चेतन बागड़िया, कमल लुहाड़िया, मंत्री राजीव बाकलीवाल, भूपेंद्र सांवला, मनोज बड़जात्या, जम्बू मितल आदि द्वारा की गई। आचार्य श्री द्वारा रचित आगमोदय ग्रंथ पर विभिन्न विद्वानों ने आलेख प्रस्तुत किए। इसमें चारों अनुयोगों का विवरण, चक्रवर्ती का वैभव, त्याग और जीवन के वास्तविक स्वरूप का सूक्ष्म विवेचन है। विद्वानों ने कहा कि आचार्य श्री ने 100 ग्रंथों का सार एक ही ग्रंथ में समाहित किया है, जो उनकी अद्भुत प्रज्ञा का प्रमाण है।

आचार्य श्री ने अपने उद्बोधन में कहा कि जैन दर्शन संपूर्ण सत्य पर आधारित है। सम्यक दर्शन का अर्थ है सत्य को जानना और उसे श्रद्धा से स्वीकार करना। उन्होंने कहा कि व्रत के बिना जीवन अधूरा है और व्रत पालन से अशुभ कर्म रुक जाते हैं। स्वाध्याय से आगम के रहस्य खुलते हैं, और विद्वानों का साथ संगोष्ठी को सार्थक बनाता है।

आहार, संलेखना समाधि और जैन साधना पर भी आलेख प्रस्तुत

गुरुदेव ने अति सुख और अति दुख को खतरनाक बताते हुए कहा कि जब यह बढ़ जाते हैं तो मर्यादा भंग होती है। धर्म करने में भाव पूजा का महत्व है, द्रव्य पूजा का नहीं। उन्होंने आगम को सर्वोच्च मानते हुए कहा कि किसी भी विषय को आगम के अनुसार ही स्वीकार करना चाहिए। विद्वत संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में मुनियों के आहार, संलेखना समाधि और जैन साधना पर भी आलेख प्रस्तुत किए गए। दोपहर के सत्र में वक्ताओं ने आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज की निर्मोहिता और उनके महान व्यक्तित्व की चर्चा की। रामगंजमंडी की इस विद्वत संगोष्ठी में जैन दर्शन के अनमोल रत्नों की उपस्थिति ने आयोजन को ऐतिहासिक और अविस्मरणीय बना दिया।

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