मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने अपने प्रवचन में जीवन के परम सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य पूरी उम्र असत्य के मोहजाल में उलझा रहता है और सत्य की अनुभूति से दूर बना रहता है। भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
भोपाल। मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने अपने प्रवचन में जीवन के परम सत्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य पूरी उम्र असत्य के मोहजाल में उलझा रहता है और सत्य की अनुभूति से दूर बना रहता है। उन्होंने प्रश्न किया-किसके साथ राग कर रहे? किसके साथ द्वेष? हम भोगों के पीछे भागते हैं और भोक्ता की उपेक्षा करते हैं। मुनि श्री ने कहा कि संत सदैव दृश्य की नहीं, दृष्टा की ओर देखने की प्रेरणा देते हैं। भोग की ओर नहीं, भोक्ता की ओर देखो। शब्द की ओर नहीं, श्रोता की ओर देखो। अनुभव की ओर नहीं, अनुभोक्ता को पहचानो। उन्होंने चार सूत्र दिए-जानो, मानो, ध्याओ और पाओ। सत्य पर बल देते हुए कहा-सत्य कथ्य नहीं, अकथ्य है। सत्य बोलने की बात नहीं, यह तो अनुभव और साधना का विषय है।
कविता के माध्यम से सत्य का बोध
मुनि श्री ने मिश्रीलाल जैन की कविता अरिहंत नाम सत्य है, सिद्ध नाम सत्य है सुनाकर समझाया कि जीवन की असली सच्चाई यह है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है। उन्होंने कहा-“न कुछ लेकर आए, न कुछ लेकर जाएंगे। जैसा करेंगे, वैसा भरेंगे। मेरा केवल ‘मैं’ हूँ, बाकी सभी संबंध संयोग हैं। उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि
“आप अकेला अव तरे, मरे अकेला होय,
क्या कहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय।”
जीवन की अनित्यता पर बल
मुनि श्री ने कहा-“बाल पक गए, कमर झुक गई, कितनी बार अस्पताल और श्मशान देख आए, फिर भी मोह-माया नहीं छूटा। जब तक जीवन की सच्चाई को अंतर्मन से स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक जीवन की दिशा और दशा नहीं बदल सकती। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब मनुष्य आत्मा के स्वभाव को पहचान लेता है, तब उसकी प्रवृत्ति में सरलता, परिणामों में निर्मलता, भावों में उज्जवलता और व्यवहार में शालीनता आ जाती है। अविनाश जैन ने बताया कि मंगलवार को उत्तम संयम और बुधवार को धूप दशमी के अवसर पर उत्तम त्याग पर विशेष प्रवचन होंगे। साथ ही “गुणायतन” के संदर्भ में भी जानकारी दी जाएगी। प्रतिदिन सायंकालीन शंका समाधान में श्रावकों की सभी शंकाओं का समाधान मुनि श्री के मुखारविंद से हो रहा है।













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