दशलक्षण महापर्व के अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में सत्य धर्म की गहन विवेचना करते हुए कहा कि वचन ही सत्य है और आत्मा ही वास्तविक सत्य है। उन्होंने कषायों को धर्म से दूर करने की साधना पर बल दिया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत प्रतिदिन धर्म के दस अंगों की विवेचना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में हो रही है। आचार्य श्री ने कहा कि चार कषायों – क्रोध को क्षमा से, मान को मार्दव से, माया को आर्जव से और लोभ को त्याग से दूर किया जाता है।
कुंदकुंद आचार्य की गाथा का उल्लेख करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मुनियों के लिए चौथा धर्म सत्य है। सत्य वचन और मान्यता ही आत्मा के हित में होते हैं। अहंकार, ममत्व और इंद्रिय सुख वास्तविक सत्य नहीं हैं। उन्होंने समझाया कि कटु, हिंसात्मक, निंदात्मक और अप्रिय वचन नहीं बोलने चाहिए। जब सत्य बोलना संभव न हो तो मौन रहना चाहिए। आचार्य श्री ने महाभारत युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि अनुचित वचनों से ही बड़ा विनाश होता है।
मधुर, हितकारी और अमृत वचन ही धर्म
आचार्य श्री ने कहा कि आत्मा ही सत्य है और जगत संसार असत्य है। मधुर, हितकारी और अमृत वचन ही धर्म कहलाते हैं। इंद्र ध्वज मंडल विधान में प्रतिदिन श्रीजी का पंचामृत अभिषेक, पूजन और विधानाचार्य पंडित कीर्तिय के निर्देशन में पूजन-अर्चना हो रही है। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र की व्याख्या तथा रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। दस लक्षण पर्व के दौरान अनेक साधु-साध्वियों एवं श्रावक-श्राविकाओं द्वारा व्रत, उपवास और धर्म आराधना निरंतर चल रही है।













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