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मन, वाणी और व्यवहार की एकरूपता ही सरलता लाती है- मुनि श्री प्रमाण सागर : उत्तम आर्जव धर्म पर धर्मसभा में बताए मुनिश्री ने सरलता के उपाय


जैसा तुम बाहर से दिखना चाहते हो वैसा अंदर से भी बन जाओ। चलो सीधा और बनो सच्चा। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज ने पर्युषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म पर व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा दूसरों को धोखा देने वाला खुद धोखा खाता है। भोपाल अवधपुरी से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर…


भोपाल (अवधपुरी)। जैसा तुम बाहर से दिखना चाहते हो वैसा अंदर से भी बन जाओ। चलो सीधा और बनो सच्चा। यह उद्गार मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज ने पर्युषण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म पर व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा दूसरों को धोखा देने वाला खुद धोखा खाता है। किस पल कौन सा खेल बदल जाए पता नहीं। फिर भी मनुष्य अपनी कुटिलता को नहीं छोड़ता। उन्होंने कहा कि आपने सांप को देखा होगा वह लहरा कर चलता है लेकिन, जब कभी अपने बिल में प्रवेश करता है तो एक दम सीधा प्रवेश करता है। संत कहते है कि दुनिया में तुम भले ही टेढ़ा चल लेना लेकिन, अपने अंदर प्रवेश करने के लिए तो आपको सीधा होना ही पड़ेगा।

मन वाणी और व्यवहार में जब एक रूपता आ जाती है। वहीं से आर्जव धर्म की शुरूआत होती है। आप लोग पूजा में प्रतिदिन पढ़ते हैं। ‘मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होये सो तन सो करिये लेकिन, करते एक दम उल्टा हैं। उन्होंने कहा कि जैसी सोच विचार की शक्ति मनुष्य के पास है। पूरे प्राणी जगत में किसी के पास नहीं। सोच सीधी होगी तो वाणी में सरलता होगी और सोच यदि टेढ़ी है तो जीवन भी जटिल होगा।

एक की सोच सकारात्मक है, वहीं दूसरे की सोच नकारात्मक

मुनि श्री ने कहा कि अपने अंतर्मन में झांककर देखिए कि आपकी सोच किधर है? आप किसी के घर गए और उसने आपके सामने आधा गिलास दूध का मेवा मिश्रित दिया। आपने उसको पिया और धन्यवाद दिया। वहीं दूसरे व्यक्ति के हाथ में वही गिलास आया। उसने कहा कि कितना कंजूस व्यक्ति है। एक की सोच सकारात्मक है, वहीं दूसरे की सोच नकारात्मक है। आपकी सोच कैसी है। इसका निर्धारण कोई दूसरा व्यक्ति नहीं करेगा। आपको स्वयं देखना होगा। हम लोग बात तो सरलता की करते है,लेकिन, काम सभी उल्टे करते है? अपनी आत्मा को पहचानो कि मैं कौन हूँ? मेरा क्या है? इतना सा यदि आत्मज्ञान हो जाए कि जो छल-कपट और मायाचारी कर रहे हैं वह किसके लिए। झूठ का आश्रय लेकर दुनिया को चमक दमक दिखा रहे हो, आखिर वह किसके लिए। मुनि श्री ने कहा कि यह पावर, पैसा काम आने वाला नहीं ,काम आएगा तो आपका असली स्वरुप, जिस दिन आप अपने अंदर की इस सच्चाई को पहचान लोगे। उसी दिन आपकी दृष्टि बदल जाएगी।

कर्मों की मार पड़ती है तो सारी सच्चाई सामने आती ह

जहां दृष्टि बदली की चिंतन की धारा बदल जाएगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब मनुष्य पर कर्मों की मार पड़ती है तो वह धरातल पर आकर सारी सच्चाई उगल देता है। उन्होंने एक उच्च अधिकारी के पद से रिटायर्ड व्यक्ति की बात रखते हुए कहा कि उन्होंने अपनी जिंदगी में खूब बेईमानी की, रिश्वत ली। उनकी पहचान रुतवे बाले अधिकारी के रूप में हो गई, लेकिन एक घटना ऐसी घटी कि उनके जीवन की दिशा बदल दी। उनका इकलौता बेटा जो पढ़ने में तेज था गोल्ड मेडलिस्ट ऑनर्स में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की लेकिन, उसके मस्तिष्क पर कोई ऐसा दबाव पड़ा कि उसकी हालत पूर्णता विक्षिप्त हो गई। उसका उन्होंने खूब ईलाज कराया लेकिन, वह ठीक नहीं हुआ। उन्होंने आकर मुझे बताया और कहा कि मैंने किसके लिए हाथ काला किया? मुझे तो ऐसा लगता है कि यह मेरे ही पापों का फल है। पहले यह बात मुझे समझ नहीं आती थी लेकिन, इस घटना ने मुझे सब कुछ समझा दिया।

यह धन, यह पैसा, यह बेईमानी, आखिर किसके लिए?

मुनि श्री ने कहा कि किस पल कौन सा खेल बदल जाए कहा नहीं जा सकता। सबको अपने अपने कर्माें का फल मिलता है। इस जन्म में न सही परभव में मिलता है। उन्होंने कहा कि अपने कर्मबंध से डरो और अपनी आत्मा पर दृष्टि केंद्रित करो। जीवन है, पानी की बूंद कब मिट जाए रे…होनी- अनहोनी कब घट जाए रे…यह दूसरों को सुनाने के लिए नहीं है। यह एक सच्चाई है। इसे स्वीकार करो, सोचो? यह धन, यह पैसा, यह बेईमानी, आखिर किसके लिए? उन्होंने कहा कि आज के इंसान कि कोई इमान नहीं, कुछ भी बोल देता है वचनों की कोई प्रामणिकता ही नहीं। पहले के लोग जो एक बार वचन दे देते थे तो उसे निभाते थे। आजकल तो इंसान की दशा गिरगिट से भी बदतर हो गई है, गिरगिट को भी रंग बदलने में समय लगता है, लेकिन मनुष्य कब रंग बदल ले और किस रूप में आ जाए पता नहीं लगता। उन्होंने कहा कि जैसा तुम बाहर से दिखना चाहते हो वैसा ही अंदर से बनो। तृतीय दिवस उत्तम आर्जव धर्म की पूजा हुई। चतुर्थ दिवस उत्तम सत्य धर्म की पूजा होगी।

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