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मुनिश्री विबोधसागर ने कहा जैन दर्शन में त्रिरत्न ही सर्वाेपरि : बड़े जैन मंदिर में मधुर प्रवचन से हो रही धर्म प्रभावना 


श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में जैन संतों के आध्यात्मिक मंगल वर्षायोग में प्रतिदिन चल रही मधुर प्रवचनों की श्रृंखला में आचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने मंगलवार को अपने भक्तों से कहा कि कहा कि जैन धर्म त्रिरत्नों पर आधारित है। इन तीन रत्नों के बिना जैन धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र, यानि कि सच्चा विश्वास, सच्चा ज्ञान और सच्चा आचरण। जैन धर्म में ये तीनों मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में आवश्यक माने जाते हैं। सम्यक दर्शन का अर्थ है, सच्चे सिद्धांतों में विश्वास रखना, सच्चे देव, शास्त्र और गुरुओं में श्रद्धा रखना। यह जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों में विश्वास है। सम्यक ज्ञान का अर्थ है, सही ज्ञान प्राप्त करना, जो वस्तुओं और परिस्थितियों को उनके यथार्थ रूप में समझता है। यह ज्ञान जैन धर्म के सिद्धांतों और दर्शन को समझने से प्राप्त होता है।

जैन दर्शन अनेकांतवाद और कर्म फल के सिद्धांतों पर केंद्रित 

सम्यक चारित्र का अर्थ है, सही आचरण करना, जो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे व्रतों का पालन करके प्राप्त होता है। यह जैन धर्म के नैतिक नियमों का पालन है। इन तीनों रत्नों का पालन करके, हम अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं और मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। जैन दर्शन एक प्राचीन भारतीय दर्शन है, जो अहिंसा, अनेकांतवाद और कर्म-फल के सिद्धांतों पर केंद्रित है। इसका मुख्य लक्ष्य आत्मा को जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति दिलाना है। जैन धर्म में, ‘आत्मा’ (जीव) को शाश्वत माना जाता है और उसका पुनर्जन्म होता है। कर्म (क्रिया) का आत्मा पर प्रभाव पड़ता है और अच्छे कर्मों से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है। आप जैसे कर्म करोगे, उसी के अनुसार सुख-दुःख का अनुभव करोगे। जैन धर्म में ईश्वर को ब्रह्मांड का निर्माता या शासक नहीं माना जाता, बल्कि एक ऐसी आत्मा माना जाता है जिसने अपने सभी कर्मों को नष्ट कर दिया है और पूर्ण ज्ञान और आनंद प्राप्त कर लिया है।

आस्थावान सदा ही अपनी गति में रहता है

आस्था का मतलब है किसी व्यक्ति, वस्तु, या विचार में दृढ़ विश्वास रखना, चाहे उसके लिए कोई ठोस प्रमाण हो या न हो। यह एक गहरा विश्वास है जो किसी के जीवन, व्यवहार और दृष्टिकोण को प्रभावित करता है। आस्था मे गति है, जीवन में जितनी भी हमारी क्रिया-प्रक्रिया है वे सब हमारी आस्था पर टिकी हुई हैं। जहां हमारी आस्था होती है वहां कितनी भी परेशानियां हों, कितने भी संकट हो, परंतु आस्थावान व्यक्ति उन संकटों से डरता नहीं है। आस्थावान सदा ही अपनी गति में रहता है और आस्था जिस पर है, उसको देखकर संपूर्ण मार्ग के संकट को वह भूल जाता है। आस्था में सुख मिलता है, अनास्था में दुःख की प्राप्ति होती है आस्था में ही अपनापन मिलता है। प्राणी मात्र के प्रति अपने आपको आस्थावान बना लो तो आपका कल्याण मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

किसी भी कथन को निश्चित दृष्टिकोण से ही सत्य माना जा सकता है  

जैन दर्शन में आस्था अथवा श्रद्धा का अर्थ ‘सम्यक दर्शन’ यानि कि सही दृष्टिकोण से है। सम्यक दर्शन में दृढ़ विश्वास रखना। यह विश्वास, ‘सम्यक ज्ञान’ (सही ज्ञान) और ‘सम्यक चरित्र’ (सही आचरण) के साथ मिलकर, मोक्ष (जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति) की ओर ले जाता है। जैन धर्म में आस्था के कुछ मुख्य पहलू हैं। अहिंसा-किसी भी प्राणी मात्र को नुकसान या कष्ट न पहुंचाना, यह जैन धर्म का मूल आधार है। सत्य-झूठ न बोलना और सत्य के मार्ग पर चलना। अस्तेय- चोरी न करना। अपरिग्रह-भौतिक संपत्ति और इच्छाओं के प्रति आसक्ति न रखना। ब्रह्मचर्य-इंद्रिय सुखों से दूर रहना। अनेकांतवाद-यह मानना कि सत्य एक ही नहीं है, बल्कि कई दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है। स्यादवाद-यह मानना कि हमारा ज्ञान सीमित है और किसी भी कथन को एक निश्चित दृष्टिकोण से ही सत्य माना जा सकता है।

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