सहारनपुर में विमर्श सागर जी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से अमर भक्ति का रहस्य बताया – विनय और झुकाव ही सच्ची भक्ति की पहचान है। पढ़िए सोनल जैन की रिपोर्ट…
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)। श्री भक्तामर स्तोत्र पर आधारित अमृतमय प्रवचनों की श्रंखला में भावलिंगी संत दिगंबराचार्य श्री विमर्शसागर जी महाराज ने आज सहारनपुर में उपस्थित श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। प्रातः 8 बजे से प्रारंभ हुए सत्संग में उन्होंने बताया कि अमर भक्त” वही बन सकता है जो विनयपूर्वक झुकना जानता है। उन्होंने कहा कि आचार्य मानतुंग स्वामी रचित भक्तामर स्तोत्र में “भक्त + अमर” का संगम है – सच्चा भक्त वही होता है जो भगवान के गुणों में अनुराग रखता है और उनके समक्ष स्वयं को समर्पित कर देता है। भक्ति का मूल झुकना है, और जो अभिमान त्यागकर विनय अपनाता है, वही महापुरुष बनता है।
तीर्थंकर आदिनाथ के नखों की कान्ति विशिष्ट
संत ने बताया कि देवता भी जिनेंद्र भगवान के चरणों में मुकुट सहित झुकते हैं। तीर्थंकर आदिनाथ के नखों की कान्ति इतनी विशिष्ट है कि इन्द्रों के मुकुट भी उसमें प्रकाशित हो उठते हैं। उन्होंने जिनवाणी का संदेश देते हुए कहा कि शुद्ध आचार और विचार ही सच्चा जैन जीवन है। जहाँ यह समाप्त होता है, वहाँ धर्म पलायन कर जाता है। संतों की संगति ही धर्म को जीवंत बनाती है।













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