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भारतवर्ष की संस्कृति का प्रतीक हाथी अब नहीं दिखेगा गली-कूचों में : PETA की कानूनी कार्रवाई से धार्मिक भावनाओं को ठेस, माधुरी हथिनी के स्थानांतरण पर विरोध


   भारत की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाले हाथी अब गांव-नगर की गलियों में नजर नहीं आएंगे। PETA के कानूनी हस्तक्षेप से धार्मिक परंपराओं को नुकसान पहुंचा है। माधुरी हथिनी का नांदनी मठ से स्थानांतरण धार्मिक आस्थाओं को आहत कर रहा है। पढ़िए पवनघुवारा भूमिपुत्र का विस्तृत आलेख…


हाथी केवल एक पशु नहीं, भारतीय संस्कृति, धार्मिकता और भगवान गणेश का प्रतीक है। परंतु अब यह जीव PETA जैसे संगठनों के दबाव में भारत की गलियों से गायब होता जा रहा है। महाराष्ट्र के नांदनी मठ से हथिनी माधुरी को जबरन वंतारा ले जाना, केवल एक स्थानांतरण नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं पर आघात है। भारतवर्ष की हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति में हाथी को केवल एक पशु नहीं, बल्कि धर्म, शक्ति और सौम्यता का प्रतीक माना गया है। गली-कूचों में घूमता हाथी न केवल बच्चों के आकर्षण का केंद्र होता था, बल्कि श्रद्धालु उसे भगवान गणेश के रूप में पूजते थे। परंतु आज यह दृश्य दुर्लभ हो चला है।

PETA नामक पशु अधिकार संगठन ने कानून की आड़ में धार्मिक प्रथाओं को बाधित करना प्रारंभ कर दिया है। सबसे हालिया उदाहरण है माधुरी हथिनी का नांदनी मठ (महाराष्ट्र) से जबरन अंबानी समूह के वंतारा प्रकल्प में स्थानांतरण। यह निर्णय करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाने वाला है।

माधुरी, जो वर्षों से नांदनी मठ में एक परिवार सदस्य की भांति रहती थी, वहां उसे श्रद्धा से पूजा जाता था। परंतु वंतारा में वह न केवल मानसिक रूप से असहज है, बल्कि उसका स्वास्थ्य भी गिरता प्रतीत हो रहा है। सूत्रों के अनुसार, इस विषय पर वंतारा प्रशासन ने कोल्हापुर प्रशासन से संवाद भी किया है और उच्चस्तरीय बैठक भी हो चुकी है।

लेखक पवनघुवारा भूमिपुत्र का मानना है कि यदि वास्तव में माधुरी वंतारा में खुश नहीं है, तो मानवीय आधार पर उसे कुछ समय के लिए पुनः नांदनी मठ में लाया जाए, जहां वंतारा की देखरेख भी बनी रहे और धार्मिक परंपराएं भी पुनर्जीवित हों।”

यह केवल एक हथिनी की बात नहीं है—यह भारत की उस संस्कृति की बात है जो आज संवेदनशीलता और आधुनिकता के बीच संघर्ष कर रही है।

हथिनी माधुरी को वापिस दो… यह अर्जी हमारी है, मर्जी तुम्हारी है!”

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