मोक्ष सप्तमी जैन धर्म का प्रमुख पर्व है। इस पर्व को मुकुट सप्तमी पर्व भी कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार इस दिन 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भगवान ने शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर जी पारसनाथ जो झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित है उसके स्वर्णभद्र कूट से मोक्ष अर्थात् मुक्ति पद को प्राप्त किया था। इसी कारण श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन मोक्ष कल्याणक भक्ति व उत्सवपूर्वक मनाते हैं। सम्मेद शिखरजी से पढ़िए, विजयकुमार जैन की यह खबर…
सम्मेद शिखरजी। मोक्ष सप्तमी जैन धर्म का प्रमुख पर्व है। इस पर्व को मुकुट सप्तमी पर्व भी कहा जाता है। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ भगवान ने मोक्ष सप्तमी को शाश्वत तीर्थ सम्मेद शिखर जी झारखंड के गिरिडीह जिला स्थित स्वर्णभद्र कूट से मोक्ष अर्थात् मुक्ति पद को प्राप्त किया था। इस कारण श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन मोक्ष कल्याणक भक्ति और उत्सवपूर्वक मनाते हैं। यह पावन दिवस त्योहार के रूप में देश भर के नगरों में जैन समाज मनाया है एवं बड़ी संख्या में सम्मेदशिखर के स्वर्णभद्र कूट पर लोग भक्तिपूर्वक निर्वाण लाडू चढ़ाने के लिए देश के विभिन्न अंचलों से पहुंचते हैं।
मोक्ष सप्तमी 31 जुलाई को मनाई जाएगी
जैनियों के तीर्थराज सम्मेदशिखर जी (गिरिडीह) एवं संपूर्ण भारत वर्ष में मोक्ष सप्तमी का पर्व श्रावण शुक्ल सप्तमी 31 जुलाई को धार्मिक उल्लास से मनाई जाएगी। भगवान पार्श्वनाथ का लगभग 3000 वर्ष पूर्व उत्तरप्रदेश के वाराणसी में राजा अश्वसेन के घर महारानी वामादेवी की कोख से जन्म हुआ था। मोक्ष सप्तमी पर्व को मनाने का यही उदेश्य है कि तीर्थंकर पार्श्वनाथ भगवान के उपदेशों को उनके अहिंसामयी सिद्धांतों को जन-जन पहुंचाया जा सके। उन्होंने कहा था कि जिस कार्य को करने में किसी भी प्राणी को पीड़ा पहुंचे और प्राणों का घात हो, वह धर्म नहीं है। भगवान पार्श्वनाथ ने जीवों के कल्याण का मार्ग बताया। भगवान पार्श्वनाथ के बताए मार्ग पर चलकर ही संसार के सभी प्राणी अपना और दूसरों का भी कल्याण कर सकते हैं। सुखी जीवन का यही एक मार्ग है। भगवान पार्श्वनाथ क्षमा के अवतार थे।













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