दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 156वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
कबीर कूते राम का, मुतिया मेरा नाउ।
गले राम की जेवड़ी, जित खींचे तित जाऊ॥
कबीर दास स्वयं को भगवान राम का वफादार कुत्ता कहते हैं।
वे कहते हैं — मेरा नाम ‘मुतिया’ है (जो आमतौर पर कुत्ते के नाम के रूप में प्रयोग होता है),
मेरे गले में प्रभु की जेवड़ी (रस्सी) बंधी है।
प्रभु जिधर भी खींचते हैं, मैं उसी ओर चल पड़ता हूँ।
उनकी आज्ञा, इच्छा और मार्ग ही मेरे लिए जीवन की एकमात्र दिशा हैं।
कबीर यहाँ “कुत्ता” कहकर खुद के माध्यम से समाज को अहंकार के विरुद्ध चेतावनी दे रहे हैं।
वे यह जताते हैं कि सच्चा साधक वही है जो अपने अस्तित्व को प्रभु के चरणों में पूर्णतः समर्पित कर देता है —
जैसे एक कुत्ता अपने स्वामी की आज्ञा का बिना सवाल पालन करता है।
कबीर कहते हैं कि मैंने अपने मन, शरीर, संकल्प, वचन और विचार — सब कुछ प्रभु को अर्पित कर दिया है।
अब मैं वही करता हूँ जो प्रभु मुझसे कराते हैं।
इस दोहे में वे समाज को यह सिखाते हैं कि
विनम्रता, समर्पण और सेवा — यही मार्ग है जो मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है।
आज का इंसान नाम, प्रतिष्ठा, अधिकार और स्वार्थ की दौड़ में उलझा हुआ है।
वह अपने जीवन की डोर स्वयं के हाथ में रखना चाहता है —
पर इससे वह और अधिक भ्रम, चिंता और तनाव में घिर जाता है।
कबीर कहते हैं —
यदि तुम सच्चे सुख और ईश्वर को पाना चाहते हो,
तो ‘कुत्ते’ जैसे विनम्र बनो।
सेवक भाव रखो।
प्रभु की डोर में बंध जाओ।
कबीर इस सेवकत्व में गर्व महसूस करते हैं।
वे कहते हैं —
“मैं कुछ नहीं, सब कुछ प्रभु हैं। मैं उनका सेवक, उनका कुत्ता हूँ।”
यही विनम्रता, यही समर्पण, और यही निष्काम भक्ति मनुष्य को सच्चे सुख और दिव्यता की ओर ले जाती है।













Add Comment