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हमें हमारे विचारों का थर्मामीटर मापना जरूरी: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी ने धर्म देशना में भक्तों को दिया मार्गदर्शन 


आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। उन्होंने कहा कि हम अंतस चेतना से अपने बारे में सोचते हैं। दूसरे के बारे में नहीं, लौकिक जीवन कहता है कि दूसरे के बारे में भी सोचें यदि नहीं सोचते हैं तो नुकसान हमारा है। इसे स्वार्थ एवं अज्ञानता कह सकते हैं। हम बुद्धि लेकर आए है लेकिन, हम विद्या का प्रयोग करते हैं।

जीवन कंप्यूटर लैपटॉप गूगल नहीं है। जीवन में बुद्धि का प्रयोग जरूरी है। यदि हम बुद्धि का प्रयोग करेंगे तो अज्ञान का काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई समय नहीं है। जब हमारे अंतस चेतना में भाव उत्पन्न नहीं होते हैं। हम दुनिया का चक्कर लगा लेते हैं। हमारे पास कंट्रोल पावर नहीं है। हमारे शराब का त्याग है फिर भी हम उसके बारे में सोचते हैं, जो हमें पसंद नहीं, हम वह भी सोच लेते हैं। मन द्वारा हम कहीं भी पहुंच जाते हैं हमारे मन में कंट्रोल नहीं।

आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए

उन्होंने कहा कि हर चीज का माप होता है दूध आदि कोई भी पदार्थ हो सबका एक माप होता है। जैन दर्शन कहता है कि हमें हमारे विचारों और भावों को मापते रहना चाहिए, समझते रहना चाहिए। सार्थक तब होगा जब हम अपने आप को मापेंगे। हमने कभी अपने आप को मापा नहीं। हमें भी अपना थर्माेमीटर मापना चाहिए की हम कितने पॉजिटिव हैं कितने नेगेटिव है। कितने ज्ञानी है।अच्छा ज्ञानी धर्मात्मा होता है लेकिन हम होते नहीं। अपने आप को मापंे कि हम कितना पॉजिटिव कितना नेगेटिव है और कोशिश करें कि हम कितने सकारात्मक हो सकते हैं। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्री ने कहा कि स्वाध्याय हमारा थर्मामीटर है। उसी से हम समीक्षा कर सकते हैं कि हम कितने सकारात्मक हैं। जैन दर्शन कहता है कि आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि व्यापार अर्जन की चीज है विसर्जन की नहीं। हम कितना पापों में सुधार कर सकते हैं। हम कितनी अपने को धार्मिकता दे सकते हैं। ऐसी वस्तुओं को क्या ग्रहण करना जो हमें खराब बनाती है।

हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए

आचार्यश्री ने कहा कि कंट्रोल पावर सबके पास है इंद्रिय विषयों ग्रहण करें बिना जीवन नहीं चलता व्यक्ति अंतस चेतना में जो भाव करता है तो लेश्या उत्पन्न करता है। सोच लिया यह मेरा घर है यह मेरी चीज है तो यह अशुभ लेश्या है और मान लिया कि यह मेरा संयोग है तो यह शुभ लेश्या है। उन्होंने कहा हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए हैं आधुनिकता दुर्गति कराती है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी आधुनिकता किस काम की जो जीवन यापन नहीं कर सके। ऐसी आधुनिकता किस काम की जो सही दिशा देने वाली नहीं है। हम बाहरी दुनिया के ढोल बजा रहे हैं और अच्छा बुरा भाव बना रहे हैं यदि हम माला जप रहे हैं तो माला जैसे भाव होना चाहिए।

आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी

उन्होंने दान के विषय में भी प्रकाश डाला यदि आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी है। जीवन यापन के अतिरिक्त यदि धन संग्रह है तो दान करना चाहिए। धन की परिभाषा है कि धन जीवन यापन के लिए कमाना चाहिए। दान के लिए नहीं धन कमाओ तो यह नहीं सोचे कि मुझे दान करना है। यह भी नहीं सोचा कि जब कमाऊंगा तो दूंगा ऐसा भाव भी नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल भावों का है क्रिया का नहीं। क्रिया सावधानी से होनी चाहिए की भाव की हानि ना हो इधर-उधर देखकर हम प्रमाद कर रहे हैं इससे शुभ भावों की हानि है। सावधानी रखनी चाहिए कि पानी पीएतो एक बूंद भी जमीन पर नहीं गिरना चाहिए यदि हम दुरुपयोग कर रहे हैं तो क्रिया और भावों में हानि है। उन्होंने कहा कि इतने भी बड़े मत हो की पापों में वृद्धि हो जाए हम हम इतने भी बड़े नहीं हो जाए की पुण्य की हानि हो जाए। धर्म सब कुछ करने के लिए तैयार है सावधानी रखो। भाव क्रिया व्यवस्थित हो भावों में हानि ना हो शुभ काम शुभ भाव शुभ लेश्या है अशुभ भाव है तो अशुभ लेश्या उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा दिमाग काम करें लेकिन, समझ काम करनी चाहिए।

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