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जीवन में जुड़ाव अपने आप होता है-मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज’: विधि के विधान से परे कुछ भी नहीं


नांद्रे में विराजित मुनिराजों के सानिध्य में मंदिर में श्रीजी का पूजन-अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएं नित हो रही है। धर्मसभा में यहा रोज मुनिश्री के प्रवचनों का धर्मानुरागी बंधु लाभ उठा रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंचकर मुनियों के आशीर्वाद भी ले रहे हैं। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…


नांद्रे। यहां विराजित मुनिराजों के सानिध्य में मंदिर में श्रीजी का पूजन-अभिषेक आदि धार्मिक क्रियाएं नित हो रही है। धर्मसभा में यहा रोज मुनिश्री के प्रवचनों का धर्मानुरागी बंधु लाभ उठा रहे हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंचकर मुनियों के आशीर्वाद भी ले रहे हैं। नांद्र में पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागर महाराज जी 1008 भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान हैं। यहां पर मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने प्रवचन में कहा कि संसार में प्रत्येक जीव सुख की चाह कर रहा है और सोचता है कि कोई ऐसा मिल जाए जो उसको सुख देकर दुःख से दूर करके चला जाए, परंतु ऐसा संभव नहीं हो पाता क्योंकि, बहुत कुछ हमारे हाथ में है लेकिन, सबकुछ नहीं है। सूरज पूर्व दिशा से जैसे ही निकलता है तो कमल खिल जाता है और सूर्य पश्चिम दिशा में जैसे ही डूबता है तो कमल मुरझा जाता है।

अब आप स्वयं विचार करो कि कमल और सूरज में क्या संबंध है। ऐसी कौन सी मित्रता है और चंद्रमा से ऐसी कौन सी शत्रुता है जो उसे देखकर मुरझा जाता है? इस प्रश्न की खोज करोगे तो उत्तर यही पाओगे की ऐसा विधि का विधान है। ऐसी वस्तु व्यवस्था है।

विधि के विधान को वस्तु व्यवस्था को हम जान सकते हैं, देख सकते हैं परंतु, उसको बदलने की शक्ति हमारे पास नहीं होती है। जब हमारे पास बदलने की ताकत नहीं है तो हम क्यों उसको लेकर विकल्प करें कि ऐसा होना चाहिए, ऐसा नहीं होना चाहिए। इसलिए प्रकृति एक-दूसरे से जुडी हुई है। संतान का जन्म स्त्री-पुरुष के संयोग से होता है। इसके संयोग के बिना नहीं होता है। इसलिए सबकुछ जान लो और अपने को आनंद में रहो।

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