समाचार

लफ्ज़ वही बोलिए जो समझ में आए और दिल में भी उतर जाए: मुनिश्री सर्वार्थ सागर जी महाराज के प्रवचनों में वाणी की संयमता पर जोर 


पथरिया में आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज का चातुर्मास चल रहा है। यहां नित पूजा, अभिषेक और शांतिधारा आदि विधियों से श्रीजी की आराधना की जा रही है। इस अवसर पर मुनिश्री सर्वाथसागरजी की धर्मसभा में उदबोधन का लाभ भी धर्मप्रेमी जनता ले रही है। पथरिया से पढ़िए, यह खबर…


पथरिया। पथरिया में आचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज का चातुर्मास चल रहा है। यहां नित पूजा, अभिषेक और शांतिधारा आदि विधियों से श्रीजी की आराधना की जा रही है। इस अवसर पर मुनिश्री सर्वाथसागरजी की धर्मसभा में उदबोधन का लाभ भी धर्मप्रेमी जनता ले रही है। रविवार को हुए प्रवचन के बारे में अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने बताया कि मुनिश्री सर्वार्थ सागरजी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि लफ्ज़, लहजा और लाज अगर ये संभले रहें, तो इंसान कहीं भी शर्मिंदा नहीं होता। आज की दुनिया में लोग बड़े-बड़े काम करने की बात करते हैं नाम कमाने की दौड़ में, शोहरत पाने की होड़ में लेकिन, बहुत कम लोग हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं। लहजे को नम्र बनाते हैं, और अपनी मर्यादा को संभालते हैं। उन्होंने कहा कि हम भूल जाते हैं कि सबसे बड़ा गुण ना पैसा है, ना पद बल्कि भाषा का संयम, स्वर की सरलता, और व्यवहार की मर्यादा ही है।

कभी-कभी हम अच्छा बोलते हैं लेकिन, लहजा ताना मारता है। कभी हमारी बात सच्ची होती है, लेकिन शब्द चुभते हैं और कभी हमारे शब्द भी ठीक होते हैं, स्वर भी अच्छा होता है लेकिन सामने वाले की इज्जत नहीं रहती हमारे अंदर, बस यहीं पर ‘लाज’ टूट जाती है।

मुनिश्री ने कहा कि याद रखिए लफ्ज़ वही बोलिए जो सामन ेवाले को समझ में भी आए और दिल में भी उतर जाए। लहजा वही रखिए जो सामनेवाले को छोटा ना करे, और आपको बड़ा ना दिखाए और लाज वो चीज़ है, जो आपके होने से किसी और को महसूस होनी चाहिए। कभी अपनी बातों से, कभी अपने व्यवहार से, और कभी अपने मौन से आप लोगों को जीत सकते हैं। इसलिए अगली बार जब बोलें तो सिर्फ आवाज़ ना निकले, इंसानियत भी झलके।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page