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जैन दर्शन का मूल आधार अहिंसा : मुनिश्री विलोकसागरजी दे रहे हैं संयम साधना के संस्कार


मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज द्वारा कक्षाओं के माध्यम से पूर्व आचार्यो द्वारा रचित ग्रंथों का पठन- पाठन चल रहा है।मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है। जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोपरि माना गया है। वैसे तो सभी धर्मों में अहिंसा धर्म को सबसे ऊपर माना जाता है, अहिंसा को ही प्रधानता दी जाती है। अहिंसा का पालन करने से व्यक्ति न केवल अपने जीवन में शांति और सद्भाव प्राप्त करता है, बल्कि दूसरों के जीवन को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। अहिंसा का पालन करने से व्यक्ति कर्मों के बंधन से भी मुक्त हो जाता है। अहिंसा परमो धर्म का अर्थ है अहिंसा परम धर्म है। यह जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से कोई हानि नहीं पहुंचानी चाहिए। जैन धर्म में अहिंसा को सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत माना जाता है। इसका अर्थ है कि किसी भी जीवित प्राणी को किसी भी रूप में नुकसान पहुंचाने से बचना, चाहे वह शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक हो। जैन धर्म में अहिंसा का पालन न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि सभी जीवित प्राणियों के लिए भी आवश्यक माना जाता है। यह उद्बोधन मुनिश्री विलोक सागर जी ने बड़े जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

मुनिश्री ने अहिंसा धर्म की व्याख्या करते हुए बताया कि जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ बहुत व्यापक है। किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, यह अहिंसा है। किसी का बुरा सोचना भी हिंसा है, किसी पर अन्याय होते देख कर खुश होना भी हिंसा है, किसी की निंदा-चुगली करना, किसी को धोखा देना, किसी पर कलंक लगाना इत्यादि सब हिंसा की श्रेणी में आता है। सही अर्थों में तो प्राणी मात्र के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार अहिंसा है।

जैन दर्शन के अनुसार पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति में भी जीवन है, अतएव पृथ्वी आदि एकेन्द्रिय जीवों की हिंसा का भी निषेध किया गया है। गृहस्थ पृथ्वी, जल-रूप, वायु-रूप, अग्नि-रूप और वनस्पति-रूप स्थावर जीवों की हिंसा से नहीं बच सकता। अतः उनके लिए एकेन्द्रिय जीवों की कम से कम हिंसा का नियम है।

 हिंसा के दो रूप बताये गये हैं 

द्रव्य-हिंसा और भाव-हिंसा। किसी के द्वारा किसी जीव की हत्या हो जाना अपने आप में हिंसा नहीं कहलाता, अपितु यदि क्रोध भाव से, मान भाव से, माया भाव से, अथवा लोभ भाव से किसी जीव के प्राणों को नष्ट किया जाता है अथवा उसे कष्ट दिया जाता है तो वह हिंसा कहलायेगा। अन्य शब्दों में क्रोध, मान, माया, लोभ, घृणा, द्वेष आदि दुर्भाव यदि मन में हैं और मारने की दुर्वृत्ति के साथ जीवों को मारा जाए या सताया जाये, तो वहाँ हिंसा होती है। इस प्रकार की हिंसा को भाव-हिंसा कहा गया है।

मुनिराज कक्षाओं के माध्यम से करा रहे स्वाध्याय

आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज, मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में विराजमान हैं। मुनिश्री विलोकसागर जी महाराज एवं मुनिश्री विबोध सागर जी महाराज द्वारा कक्षाओं के माध्यम से पूर्व आचार्यो द्वारा रचित ग्रंथों का पठन- पाठन चल रहा है।

कक्षाएं लगने का समय

प्रातः – 8 से 8:45 बजे तक समयसार

प्रातः- प्रातः 8:45 से 9:30बजे तक रयणसार

दोपहर- 3:45 से 4:30 बजे तक रत्नकरण्ड श्रावकाचार

सांय काल- 6:30 से 7:30 बजे तक स्तोत्र एवं पाठों का पठन।

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