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लोग समझदारी का प्रयोग नहीं करते है : आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने धर्म ध्यान के बारे में समझाया


बुधवार की प्रातः बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज की धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। मंगलाचरण वंदना बाबरिया द्वारा किया गया। धर्म सभा का संचालन पदम सुरलाया ने किया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी बुधवार की प्रातः बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज की धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ। मंगलाचरण वंदना बाबरिया द्वारा किया गया। धर्म सभा का संचालन पदम सुरलाया ने किया। आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन देते हुए धर्म ध्यान के विषय में समझाया। उन्होंने कहा कि परिवार चलाना धर्म है मंगल नहीं। लौकिक कार्यों का संपादन करना धर्म है लेकिन, मंगल नहीं है। समाज की सेवा करते हैं उससे समाज का कल्याण तो हो सकता है लेकिन, आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा लोग बड़ी भ्रांति में है कि धर्म से धन मिलता है। परिवार अच्छे से चलता है। धर्म से शरीर निरोग होता है। धर्म का काम होता है कि आत्मा को कल्याण मार्ग में लगाए। जो परिवार धन की बात कर रहे हो वो धर्म का फल है। धर्म का सीधा-साधा काम होता है कि वह आत्म कल्याण के मार्ग खोलता है। आचार्य ने कहा है कि पहले यह बोल यह होना चाहिए कि हमें धर्म धारण करना है। 8 वर्ष के बच्चे की बुद्धि जैसे ही जागृत होती है तब धर्म करने योग्य हो जाता है।

आपका अनुभव का मुकाबला मैं नहीं कर सकता

समझदार होना काफी नहीं है समझदारी का प्रयोग करना महत्वपूर्ण है लोग समझदार तो होते हैं लेकिन समझदारी का प्रयोग नहीं करते समझदारी मिली है तो उसका प्रयोग तो करो।समझदार हो ज्ञानवान हो पढ़ लिख लो लेकिन यह काफी नहीं होता है। बच्चे पढ़ लिख जाते हैं और माता-पिता से कहते हैं कि आपका जमाना नहीं है यह समझदारी नहीं है लेकिन, समझदारी तो यह है कि बच्चा यह कहे कि आपका अनुभव का मुकाबला मैं नहीं कर सकता ऐसी सोच ऐसे वचन यह समझदारी हो सकती है। सही समय पर समझदारी का उपयोग किया जाना चाहिए धर्म धारण किया जाता है किया नहीं जाता धर्म आत्मा में धारण होता है धर्म की खोज करेंगे तो यह आत्मा में मिल जाएगा।

आप दिगंबर मुद्रा का सम्मान कर रहे हैं

धर्मात्मा के भीतर ही धर्म का वास होता है। ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं जहां भी धर्म क्रिया चल रही है वहां धर्म है। आप साधु भगवंत को नमोस्तु करते हैं। आप दिगंबर मुद्रा का सम्मान कर रहे हैं। सीधा अर्थ है कि धर्म जब भी मिलेगा धर्मात्मा के पास मिलेगा धर्म से बात करना है तो धर्मात्मा के पास चले जाना धर्म धर्मात्मा के पास बसता है। इंद्रिय विषय सुख सुख नहीं होता। धर्म से जो सुख मिलता है, वह आदमी सुख होता है। अंतर चेतन वाला सुख सदा सुख देने वाला होता है। जो धर्म धारण करता है, वह धर्म ध्यान होता है। धर्म का भाव विचार आता है, वह धर्म ध्यान कहलाता है।

वर्तमान शिक्षा पद्धति तिजोरी में

वर्तमान शिक्षा पद्धति पर कटाक्ष करते हुए गुरुदेव ने कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति तिजोरी में पड़ी है हम पढ़ लेते हैं लेकिन, कुछ नहीं कर पाते आपके पूर्वज जब काम करते थे तो उनके पास यह नहीं होते लेकिन, आज हम हर चीज के लिए अलग-अलग व्यक्ति चाहिए नल वाला कपड़े वाला सब कुछ अलग चाहिए। पहले घर में दो-तीन लोग होते थे। सब काम कर लेते थे। पूछा जाता है कि आप मंदिर क्यों नहीं आए तो के पानी नहीं आया। आप कैसे समझदार हैं समझदारी है तो उसका सही प्रयोग नहीं हो रहा है समझदारी का मतलब धर्म धारण करने की योग्यता आनी चाहिए। धर्म ध्यान की क्रिया चांदनी देने वाली होती है। जैन दर्शन कहता है समझदारी प्रयोग दिल और दिमाग दोनों का प्रयोग है। दोनों का संगम का प्रयोग करेंगे तो नियम से पास होंगे। अंतरंग प्रवृत्ति धर्म की होना चाहिए। धर्म ध्यान प्रति समय आता है। वह धर्म ध्यान सकारात्मकता देगा और आगे श्रेष्ठ अनुकूलता मिलेगी।

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