आचार्य श्री विमर्श सागर जी का (ससंघ 30 पिच्छी) का मंगल पदार्पण सहारनपुर की धरा के लिए एक अनूठा इतिहास बन गया। बुधवार को आचार्य संघ के सानिध्य में जैन बाग के श्री 1008 महावीर जिनालय में जैन धर्म के 22 वें तीर्थकर श्री नेमिनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक महा महोत्सव हर्षाेल्लास से मनाया गया। सराहनपुर से पढ़िए, यह खबर…
सराहनपुर। आज से होगी भावी सिद्धों के सानिध्य में अनंतानंत सिद्धों की आराधना, सौभाग्य जागा है सहारनपुर का। प्रथम बार विशाल चतुर्विध संघ के साथ पधारे हैं संघ शिरोमणि आचार्य भगवन। जो अपनी भाव साधना से इस पंचमकाल में भी करा रहे है चतुर्घकालीन श्रमणों की विशुद्ध चर्या का दर्शन, ऐसे ‘जीवन है पानी की बूंद’ महाकाव्य के मूल रचियता आचार्य श्री विमर्श सागर जी का (ससंघ 30 पिच्छी) का मंगल पदार्पण सहारनपुर की धरा के लिए अनूठा इतिहास बन गया। बुधवार को आचार्य संघ के सानिध्य में जैन बाग के श्री 1008 महावीर जिनालय में जैन धर्म के 22 वें तीर्थकर श्री नेमिनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक महा महोत्सव हर्षाेल्लास से मनाया गया। जिनालय में प्रातः कालीन बेला में भगवान की महापूजा के साथ निर्वाण मोदक (लाडू) चढ़ाया गया। आचार्य श्री ने भगवान नेमिनाथ के मोक्ष कल्याणक पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म के 22 वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ स्वामी देवों के द्वारा पंच कल्याणकों के साथ महापूजा को प्राप्त हुए। इस धरा पर एक मात्र तीर्थकर भगवान ही होते हैं जिनकी तीनों लोकों के देवी-देवता आराधना-पूजा करने इस धरती पर आते हैं। ऐसे 22 वें तीर्थकर नेमिनाथ स्वामी ने गुजरात प्रांत के श्री गिरनार पर्वत से निर्वाण मोक्ष प्राप्त किया। वास्तव में आज हम-आप प्रभु के निर्वाण के लिए नहीं, अपित अपने दुखों के नाश के लिए एवं अपने निर्वाण प्राप्ति के लिए प्रभु के चरणों की आराधना करके यह निर्वाण लाडू समर्पित करते हैं। आचार्य श्री ने धर्मसभा को संबोधित करते हुये कहा कि आज मानव अपने ही स्वरूप को भूलता जा रहा है।
इसीलिए भगवान के दर्शन तो करता है किन्तु कभी भगवान के स्वरूप की महिमा गाते हुए दर्शन नहीं कर पाता। अरहंते स्वरूप का दर्शन तो निज आत्म स्परूप से हुआ करता है। जैन बाग स्थित जैन मंदिर में आचार्य संघ के सानिध्य में प्रारंभ हो रहे श्री सिद्धचक्र महामण्डल विधान के मध्य 4 जुलाई को आचार्य श्री विरागसागर जी का समाधि दिवस मनाया जाएगा। 4 जुलाई 2024 को महाराष्ट्र प्रांत के जालना नगर में आचार्य श्री विरागसागर जी ने इस युग की सर्वश्रेष्ठ समाधि के साथ अपनी देह का परित्याग किया था, जो संपूर्ण श्रमण संस्कृति के लिए आदर्श रूप में चिरकाल तक अनुकरणीय रहेगी। जैन बाग जैन मंदिर में आचार्य श्री विमर्शसागर जी एवं उनका शिष्य समूह भावविनयांजाल समर्पित करेंगे।













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