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गुणायतन पावनधाम में ध्वजारोहण: वेदी प्रतिष्ठा जिन बिम्ब स्थापना का शुभारंभ


साधुओं की शोभा साधनों से नहीं उनकी साधना से होती है, श्रावकों की शोभा भवनों से नहीं भावना से होती है। यह मंगल उद्बोधन मुनि श्री समतासागरजी महाराज ने दिए। गुणायतन धाम में गुरुवार को ध्वजारोहण सहित अन्य कार्यक्रमों के साथ वेदी प्रतिष्ठा और जिनबिंब स्थापना महामहोत्सव का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर मुनिश्री ने अपनी मंगल देशना से उपस्थित समाजजनों को प्रेरणा प्रदान की। सम्मेद शिखर जी से पढ़िए, राजकुमार जैन अजमेरा की यह खबर…


सम्मेदशिखर जी/कोडरमा। आचार्य श्री विद्यासागरजी एवं आचार्य श्री समयसागर महाराज के आशीर्वाद से मुनि श्री समतासागर महाराज ससंघ के सानिध्य तथा मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज की प्रेरणा एवं मुनि श्रीपवित्र सागर, मुनि श्री पूज्यसागरजी महाराज, मुनिश्री अतुलसागर जी, मुनिश्री आदिसागरजी, आर्यिका श्री गुरुमति माताजी, आर्यिका दृणमति माताजी तथा संघस्थ 42 माता जी, ऐलक श्री निश्चयसागर, ऐलक श्री निजानंद सागर, क्षुल्लक श्री संयम सागर के संघ सानिध्य में प्रतिष्ठाचार्य वाल ब्रह्मचारी अशोक भैया इंदौर तथा उदासीन आश्रम के अधिष्ठाता अनिल भैया के निर्देशन में घट यात्रा गुणायतन से प्रारंभ हुई जो गाजेबाजे के साथ पावनधाम पहुंची। यहां पर चतुर्विद संघ के सानिध्य में ध्वजारोहण ईशान दिशा के साथ शुभारंभ हुआ। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं गुणायतन के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेंद्र जैन छाबड़ा ने बताया प्रातः 5.45 बजे भगवान का अभिषेक किया गया। मुनि श्री समतासागर महाराज के मुखारबिंद से शांतिधारा हुई एवं घटयात्रा गुणायतन स्थित जिनालय से निकालकर ‘श्री पावनधाम जिनालय’ पहुंची। मंत्रोच्चारण के साथ ध्वजारोहण सुनील पहाड़िया परिवार जयपुर ने किया। इस अवसर पर मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि ईशान दिशा की ओर ध्वजा का जाना संकेत देता है कि धर्म की वृद्धि तो रहेगी ही रहेगी साथ ही धनधान्य की समृद्धि भी रहेगी।

धर्मायतन का निर्माण और साधुओं की सेवा सम्यक् दर्शन का कारण मान्य 

मुनि श्री ने कहा कि सभी धर्मों के अपने अपने ध्वज है जैन परंपरा में पचरंगा ध्वज ‘पंचपरमेष्ठी’ का प्रतीक है। जो अहिंसा और शांति का संदेश दुनिया को प्रदान करता है। मुनिश्री ने कहा कि क्षेत्र विशेष पर जब धार्मिक अनुष्ठान होता है तो हजार गुणा पुण्य की वृद्धि हो जाया करती है। मुनि श्री ने बताया कि मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज कमेटी को बार-बार निर्देश देते हैं। उनको भी चिंता रहती है कि ‘गुणायतन’ में इतनी बड़ी संख्या में पहली बार साधुओं का समागम हो रहा है। लगभग 42 आर्यिका तो वर्तमान में हैं ही तीन और आ रही हैं। अतः वह कमेटी को मार्गदर्शन देकर सुचारू प्रवंध भी देख रहे हैं और कमेटी के पदाधिकारी संपर्क में लगे रहते है। मुनि श्री ने कहा कि ‘साधू की शोभा साधनों से नहीं साधना से होती है, श्रावकों की शोभा भवनों से नहीं भावना से होती है’। हम लोगों की यहां पर आकर बहुत अच्छी साधना चल रही है। ऊपर पहाड़ की भी एक वंदना प्रशस्त वातावरण के साथ हो चुकी है। उन्होंने इस अवसर पर इंदौर के भरत मोदी और अशोक पाटनी आरके मार्बल परिवार के नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्मायतन का निर्माण और साधुओं की सेवा साक्षात सम्यक् दर्शन का कारण माना गया है।

‘पंचायत न करो पंचपरमेष्ठी की आराधना करो’

इस अवसर पर पवित्र सागर महाराज ने कहा कि क्षेत्र पर आकर के जो विषय भोग की वस्तुओं में रम जाता है। वह भगवान के दर्शन को प्राप्त नहीं कर सकता। मुनिश्री पूज्यसागरजी महाराज ने कहा कि भारत में अनेक क्षेत्र और सिद्ध क्षेत्र है, लेकिन जिस क्षेत्र में समूची जैन समाज के हमेशा प्राण अटके रहते हैं। ऐसा सिद्ध क्षेत्र है तो वह सम्मेदशिखर जी क्षेत्र है। जिसके नाममात्र से पुण्य का बंध हो जाता है’। इस अवसर पर आर्यिका दृणमति माताजी ने कहा 42 वर्ष पश्चात वंदना करने का अवसर प्राप्त हुआ है वर्ष 1983 में हम यंहा आचार्य श्री के साथ आऐ थे। उन्होंने कहा कि कभी भी किसी की निंदा या उससे ईर्ष्या मत करो। यह जीव दूसरे की निंदा करने से नीच गौत्र का बंध करता है। आचार्य श्री हमेशा कहा करते थे ‘पंचायत न करो पंचपरमेष्ठी की आराधना करो फिर संसार न छूटे तो हमसे कहना’ अर्थात मंदिर में आकर इधर-उधर की बात करना, एक दूसरे से ईर्ष्या या द्वेष रखना, यह सभी संसार को बढ़ाने वाले हैं। उन्होंने सभी को नियम दिया कि कम से कम क्षेत्र पर आकर तो इन सभी कार्य से बचना चाहिए। कार्यक्रम में गुणायतन के यशस्वी अध्यक्ष विनोद काला कोलकाता ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर महामंत्री अशोक पांडया, सहित समस्त गुणायतन परिवार एवं बड़ी संख्या में स्थानीय तथा कोडरमा, गया, धनबाद, मधुबन के साथ आसपास के श्रद्धालु उपस्थित थे।

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