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धर्मसभा में दिए प्रवचन : धर्म जड़ नहीं, चेतन तत्व है — मुनिश्री विलोक सागर


धर्म की रक्षा करना, उसके सिद्धांतों और संयम के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग करना ही सच्चा धर्म है। धर्म किसी जड़ वस्तु का नाम नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप है। उक्त विचार दिगंबर जैन संत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने स्थानीय बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। पढ़िए मनोज जैन नायक की यह रिपोर्ट…


मुरैना। “धर्म की रक्षा करना, उसके सिद्धांतों और संयम के मार्ग पर चलने वालों का सहयोग करना ही सच्चा धर्म है। धर्म किसी जड़ वस्तु का नाम नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप है।” उक्त विचार दिगंबर जैन संत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने स्थानीय बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि यदि समाज में कोई गंदगी पनप रही है, तो कहीं न कहीं हम सभी उसके लिए जिम्मेदार हैं। यदि हमने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया होता, तो शायद वह विकृति जन्म नहीं लेती। उन्होंने जोर देकर कहा कि “गलत का विरोध न करना, गलत का समर्थन करना है। समय रहते हमें अन्याय और अधर्म का प्रतिरोध करना चाहिए।” मुनिश्री ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति संयम का कोई नियम लेता है, तो उसके पालन में समाज को सहयोग करना चाहिए। जब हम किसी के सहायक बनते हैं, तभी समय आने पर कोई हमारा भी सहायक बनता है। “दुर्भाग्यवश, हम संयमी व्यक्ति की निंदा तो करने लगते हैं, पर उसकी साधना में सहायक नहीं बनते।”

परिणाम शुद्ध हों, तभी हिंसा का दोष नहीं

मुनिश्री ने कहा कि यदि किसी कार्य को पूर्ण सावधानी से किया जा रहा हो और अनजाने में कोई हिंसा हो जाए, तो उसका दोष उस व्यक्ति को नहीं लगता। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “यदि आप मंदिर में बैठकर पूजन कर रहे हैं, लेकिन आपका मन भटक रहा है और विकारों से भर गया है, तो आप अहिंसक नहीं माने जाएंगे। भावों की शुद्धि अनिवार्य है।”

शुद्ध भावों से ही जीवन में मंगल संभव

अपने प्रवचन में उन्होंने स्पष्ट किया कि भावों की विशुद्धता से ही जीवन में मंगल संभव है। यदि भाव अशुद्ध हैं, तो अमंगल भी हो सकता है। “अपने इष्ट और गुरु के दर्शन तभी फलदायी होंगे जब आपके भाव पवित्र हों,” उन्होंने कहा। उन्होंने संयमी साधकों की उपासना और साधना में सहयोग करने को परम धर्म और कर्तव्य बताया।

भावों की परिणति का उदाहरण

एक प्रेरणादायक कथा के माध्यम से मुनिश्री ने भावों की शक्ति का महत्व बताया। एक गांव में मंदिर के पुजारी और एक वेश्या, दोनों एक-दूसरे की वादनाओं को सुनते थे। पुजारी वेश्या के घुंघरुओं की झंकार से आकर्षित होकर सोचता कि वह भी उसके नृत्य का आनंद लेता, जबकि वेश्या मंदिर की घंटियों को सुनकर आत्मग्लानि से भर जाती और प्रभु भक्ति की कामना करती।

“भावों की परिणति यह हुई कि पुजारी मरणोपरांत नरकगामी हुआ और वेश्या स्वर्गगामी,” मुनिश्री ने बताया। इस कथा के माध्यम से उन्होंने समझाया कि कर्म से अधिक महत्वपूर्ण है—भावों की शुद्धता।

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