दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -85 ईश्वर का नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक आत्मिक ऊर्जा है : आत्मज्ञान जलाता है सभी बुराइयों को


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 85वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“जब ही नाम हृदय धरयौ, भयो पाप का नाश।

मानो चिनगी अग्नि की परी पुरानी घास॥”


इस दोहे का अर्थ केवल बाहरी पापों के नाश से नहीं, बल्कि आंतरिक विकारों, जैसे अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और भौतिक इच्छाओं के नाश से है। जब मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर का नाम लेता है, तो यह उसके भीतर एक शक्तिशाली परिवर्तन लाता है। यह परिवर्तन केवल कर्मों में नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक स्तर पर भी होता है।

 

यहां “नाम” केवल किसी शब्द या मंत्र का जाप नहीं, बल्कि आत्मा की परमात्मा से गहरी अनुभूति और आत्मसात करने की अवस्था है। जब यह अवस्था प्राप्त होती है, तो व्यक्ति के भीतर से अज्ञान और अंधकार मिट जाता है।

 

“मानो चिनगी अग्नि की परी पुरानी घास”

यह उपमा बहुत गहन अर्थ रखती है। “चिनगी” यानी छोटी-सी चिंगारी और “पुरानी घास” यानी वर्षों से संचित बुराइयां, विकार और सांसारिक मोह। कबीर यह समझाना चाहते हैं कि ईश्वर का नाम एक चिंगारी की तरह है, जो हृदय में जलते ही उन सभी पुराने और गहरे संस्कारों को भस्म कर देता है, जो मनुष्य को सांसारिक बंधनों में जकड़े रखते हैं।

 

मनुष्य के भीतर कई जन्मों से संचित वासनाएं, बुरे विचार और अज्ञान रूपी घास होती हैं। ये घास इतनी पुरानी होती हैं कि उसे मिटाने के लिए कोई बाहरी प्रयास पर्याप्त नहीं होता। लेकिन जब कोई सच्चे मन से ईश्वर का नाम ग्रहण करता है, तो यह आत्मज्ञान की एक चिंगारी की तरह कार्य करता है, जिससे सारी आसक्ति और अज्ञान जलकर समाप्त हो जाते हैं।

 

इस दोहे का सबसे गहरा संदेश यह है कि ईश्वर का नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक आत्मिक ऊर्जा है, जो मनुष्य के भीतर बसी नकारात्मकता को जलाकर उसे मुक्त कर सकती है। लेकिन यह तभी संभव है, जब इसे बाहरी रूप से नहीं, बल्कि आंतरिक रूप से हृदय में धारण किया जाए।

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