दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -61 ईश्वर का न्याय सबसे अलग और परे है : मनुष्य को केवल दिखावे के लिए धर्म-कर्म नहीं करना चाहिए


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 61वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


साईं मेरा बानिया, सहजी करें व्यापार।

बिन डांडी, बिन पालड़े, तोले सब संसार॥


कबीर दास जी ने अपने दोहों में परमात्मा के स्वरूप को विभिन्न उपमाओं के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। इस दोहे में उन्होंने ईश्वर को एक व्यापारी (बानिया) के रूप में प्रस्तुत किया है, जो संसार का न्याय और कर्मों का लेखा-जोखा बिना किसी भौतिक साधन के करता है। यह दोहा परमात्मा की अद्भुत न्यायप्रियता, संसार के वास्तविक स्वरूप और मनुष्य के कर्मों के गूढ़ रहस्य को उजागर करता है।

 

कबीर जी कहते हैं कि ईश्वर इस संसार के सबसे बड़े व्यापारी हैं, लेकिन उनका व्यापार सांसारिक व्यापार की तरह नहीं है, जिसमें मुनाफा, घाटा, छल-कपट, तोल-मोल किया जाता है। ईश्वर का न्याय सबसे अलग और परे है क्योंकि वे बिना किसी तराजू (पालड़े) और बिना किसी डांडी (बटखरा) के संसार के कर्मों को तौलते हैं।

 

इसका अर्थ यह है कि ईश्वर के पास भौतिक साधन नहीं हैं, फिर भी वे प्रत्येक जीव के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब रखते हैं। वे किसी लिखित गणना या बाहरी प्रमाण पर निर्भर नहीं करते, बल्कि प्रत्येक आत्मा के भीतर स्थित सत्य को जानते हैं और उसी के अनुसार कर्मफल प्रदान करते हैं।

 

मनुष्य को केवल दिखावे के लिए धर्म-कर्म नहीं करना चाहिए, बल्कि सच्चे भाव से अच्छे कर्म करने चाहिए क्योंकि ईश्वर बिना किसी बाहरी पैमाने के सच्चाई को पहचानते हैं। समाज में हम अक्सर दूसरों को उनके पद, प्रतिष्ठा, धन-संपत्ति, बाहरी आचरण आदि से परखते हैं, लेकिन असली मूल्यांकन व्यक्ति के आंतरिक गुणों से किया जाना चाहिए।

 

आज के समय में लोग छल-कपट और धोखाधड़ी से व्यापार करते हैं, जबकि ईश्वर का व्यापार पूर्णत: निष्पक्ष और सत्य आधारित है। इस दोहे से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें भी अपने जीवन में बिना किसी छल-कपट के सत्य और न्याय का पालन करना चाहिए। यह सिखाता है कि सफलता केवल बाहरी साधनों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि हमारी नीयत, परिश्रम और ईमानदारी पर निर्भर करती है।

 

कई लोग मानते हैं कि तरक्की के लिए बाहरी साधनों (सिफारिश, रिश्वत, धोखा) की जरूरत होती है, लेकिन यह दोहा बताता है कि वास्तविक न्याय और सफलता निष्कपट कर्मों से ही मिलती है। जैसे ईश्वर बिना किसी तराजू के सटीक मूल्यांकन कर सकते हैं, वैसे ही अगर हम अपने जीवन में सत्य, ईमानदारी और न्याय को अपनाएं, तो बिना किसी विशेष संसाधन के भी हमें सफलता मिलेगी।

 

व्यापार, नौकरी, रिश्तों—हर जगह अगर हम ईमानदारी और निष्पक्षता से काम करें, तो दीर्घकालिक सफलता और शांति प्राप्त होगी। कबीर दास जी का यह दोहा केवल परमात्मा के न्याय का बखान नहीं करता, बल्कि हमें यह सिखाता है कि हमें अपने जीवन में भी निष्पक्षता, सत्य, ईमानदारी और कर्म पर विश्वास रखना चाहिए। यदि हम इस दोहे के गहरे अर्थ को समझकर अपने जीवन में उतारें, तो हमारा जीवन सच्चे अर्थों में सफल और शांतिपूर्ण बन सकता है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
3
+1
1
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page