राजस्थान की धरती पर जैन संतों ने अपनी विद्वता, साहित्य धर्मिता निभाकर जन-जन को आंदोलित किया। धर्म और साहित्य के दम पर जैन धर्म की नींव को मजबूत करने के लिए संतों ने कोई कमी नहीं छोड़ी। शिष्य परंपरा की अनूठी मिसाल यहां देखने में आती है जो अन्यत्र नहीं नजर आती। भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति जी भी इसी तरह के राजस्थान के लोकप्रिय संत रहे हैं। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 18वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..
इंदौर। राजस्थान जैन संतों के बारे में, उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में लिखना सूर्य को दीया दिखाना होता है। राजस्थान की धरा पर जितने भी संत हुए हैं उनमें सुरेंद्रकीर्तिजी का अच्छा स्थान है। वे भट्टारक नरेंद्र कीर्ति के शिष्य थे। इनका गृहस्थ अवस्था का नाम दामोदरदास था तथा ये काला गोत्रीय खंडेलवाल जाति के श्रावक थे। ये बड़े भारी विद्वान एवं संयमी श्रावक थे। प्रारंभ से ही उदासीन रहते और शास्त्रों का पठन-पाठन भी करते थे। एक बार भट्टारक नरेंद्रकीर्ति का सांगानेर में आगमन हुआ तो उनका दामोदरदास से साक्षात्कार हुआ। पहली भेंट में ही ये दामोदरदास की विद्वता एवं वाकचातुर्य से प्रभावित हो गए और उन्हें अपना प्रमुख शिष्य बनाने को उद्यत हो गए। जब इन्हें अपने स्वयं शेष जीवन पर अविश्वास होने लगा तो भट्टारक गादी पर दामोदरदास को बिठाने की योजना बनाई गई। एक भट्टारक पट्टावली में इसका उल्लेख मिलता है।
सुरेंद्रकीर्ति जी को संवत 1722 में भट्टारक बनाया
सांगानेर और आमेर के प्रमुख श्रावकों ने एक स्वर से दामोदरदास को भट्टारक बनाने की अनुमति दे दी। वे उसके चरित्र एवं विनय तथा पांडित्य की प्रशंसा करने लगे। दामोदरदास को सांगानेर से बड़े ठाट-बाट के साथ आमेर लाया गया। उन्हें संवत 1722 में विधिवत भट्टारक बना दिया गया। अब दामोदरदास से उनका नाम भट्टारक सुरेंद्रकीर्ति हो गया। इनका पाटोत्सव बड़ी धूमधाम से हुआ। स्वर्ण कलश से स्नान करवाया गया। सारे राजस्थान में प्रतिष्ठित श्रावकों ने इस महोत्सव में भाग लिया।
विहार कर समाज सुधार एवं साहित्य प्रचार किया
सुरेंद्रकीर्ति की योग्यता एवं संयम की चारों ओर प्रशंसा होने लगी और शीघ्र ही इन्होंने पूरे राजस्थान पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। ये केवल 11 भट्टारक रहे, लेकिन इस अल्प समय में ही इन्होंने सब ओर विहार करके समाज सुधार एवं साहित्य प्रचार का बड़ा भारी कार्य किया। इन्हें कितने ही स्थानों से निमंत्रण मिलते। जबये आहार के लिए जाते तो श्रावक इन पर सोने-चांदी के सिक्के न्योछावर करते और इनके आगमन से अपने घर को पवित्र समझते। वास्तव में इन्हें अत्यधिक आदर एवं सत्कार मिला। सुरेंद्रकीर्ति साहित्यिक भी थे। इनके काल में आमेर शास्त्र भंडार की अच्छी प्रगति रही। कितनी ही नई प्रतियां लिखवाई गईं। कितने ही ग्रंथों का जीर्णोद्धार किया गया।













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