अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में पहुंचा, जहां 12 दिवसीय भक्तामर मंडल विधान का आयोजन शुरू हुआ। विधान के पहले दिन अनेक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इस अवसर पर सौधर्म इन्द्र सूर्यकांत रजनी जैन और श्रीमती कल्पना, रुचि, मोनू, शुभ, लाभ जैन ने विशेष भूमिका निभाई। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन भी हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में पहुंचा, जहां 12 दिवसीय भक्तामर मंडल विधान का आयोजन शुरू हुआ। विधान के पहले दिन अनेक धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। समाज के अध्यक्ष विनोद जैन ने बताया की 12 दिवसीय सौधर्म इंद्र इंद्राणी संजय सीमा जैन परिवार है। इस अवसर पर आज के सौधर्म इन्द्र सूर्यकांत रजनी जैन और श्रीमती कल्पना, रुचि, मोनू, शुभ, लाभ जैन ने विशेष भूमिका निभाई।
भगवान की शांतिधारा संजय जैन द्वारा अर्पित की गई, जबकि ध्वजारोहण का कार्य कमलेश कुमार और नीता जैन ने किया। मुख्य कलश स्थापना कल्पना, रुचि, मोनू, शुभ, लाभ जैन ने की। अन्य कलश स्थापना विभूति ऋषभ जैन, ममता रत्नेश जैन, रूमा संदीप गंगवाल, रिंकी भरत जैन ने की। अखंड दीप प्रज्वलन का कार्य कल्पना और रुचि मोनू जैन ने किया।
द्रव्य दातार परिवार चंद्रकांता, भरत ऋतु, आदिश, आरिश जैन रहे। अष्ट प्रतिहार्य अशोक सुनील सालगिया, निर्मला जैन, शीला सोनी, कुसुम गुना वाले, हेमलता गंगवाल, सरला जैन, ज्योति जैन, विभूति जैन द्वारा स्थापित किए गए। मंडल पर ध्वज स्थापित करने का सौभाग्य बसंती सरावगी, संध्या जैन, उषा जितेंद्र जैन, विपिन जैन, कल्पना जैन, सीमा जैन, डॉक्टर चंद्रकीर्ति, दिव्या जैन, कुसुम गुना वाले, अनिता देवेंद्र जैन को प्राप्त हुआ।
पहले दिन काव्य 1, 2, 3, और 4 की आराधना की गई, जिसमें 224 अर्घ्य मंडल पर चढ़ाए गए। मंडल पर चार यंत्र स्थापित करने का लाभ अनिता देवेंद्र जैन, विपिन कुमार जैन, श्रीपाल जैन, सुषमा पी. सी. जैन को प्राप्त हुआ। चित्रानावरण, दीप प्रज्वलन और मुनि श्री के पाद पक्षालन का कार्य पीसी जैन द्वारा किया गया, और मुनि श्री को शास्त्र भेंट सौरभ शिल्पा पालवीया और नीता प्रदीप जैन द्वारा किया गया।
भाव का होना अत्यंत आवश्यक
इस अवसर पर अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि पूजन, अर्चन और भक्ति के माध्यम से श्रावक पंचपरमेष्ठी भगवान के गुणों का गान करते हैं और उनका चिंतन करते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन सबके साथ भाव का होना अत्यंत आवश्यक है। पूजा और पूजन दोनों का अर्थ एक ही है।
मुनि श्री ने बताया कि पूजा में जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप और फल का उपयोग किया जाता है। तिलो शास्त्र में कहा गया है कि झारी, कलश, दर्पण, छत्र, चामर, जल, गंध, कुमकुम, मोतियों, अक्षत, पुष्प की माला, धूप, फल, और दाख जैसे पदार्थों से भी पूजा की जा सकती है।
महापुराण में उल्लेख है कि भरत चक्रवर्ती ने पके हुए आम, जामुन, कटहल, केला, अनार, सुपारी, और नारियल जैसे फलों से पूजा की थी। जिनेन्द्र भगवान के उपयोग के लिए द्रव्य देना भी पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग है। जो लोग द्रव्य चढ़ाने में असमर्थ हैं, वे भावों के माध्यम से भगवान के गुणों का गुणगान कर भाव पूजा कर सकते हैं।
पूजा के साथ गान और नृत्य करने का विधान है, जो असंख्यात गुना कर्मों की निर्जरा में सहायक है। भगवान के मंदिर में उपयोगी द्रव्यों को भक्ति के साथ अर्पित करना भी पूजा है।रत्नकरण्ड श्रावकाचार के अनुसार, पूजा के पांच अंग हैं: आह्वान, स्थापना, सन्निधिकरण, पूजन, और विसर्जन।
पूजा दिन में तीन बार की जा सकती है: सुबह 4 बजे, दोपहर 12 बजे, और शाम 6 बजे। महापुराण में याग, यज्ञ, पूजा, सपर्या, इज्या, अध्वर, मख और मह जैसे कई शब्द पूजा के पर्यायवाची हैं।














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