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धूमधाम से मनाया गया अक्षय तृतीया पर्व ओम शब्द से होती मोक्ष की प्राप्ति– मुनि श्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज

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सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……


कुंडलपुर। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में अक्षय तृतीया पर्व धूमधाम से मनाया गया ।इस अवसर पर प्रातः भक्तांमर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा ,पूजन, विधान हुआ। ज्ञान साधना केंद्र परिसर के सामने पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर जी महाराज की पूजन हुई। मुनि संघ एवं आर्यिका संघ की आहार चर्या संपन्न हुई ।

जैसे विचार मन में रहते है कार्य होता वैसा 

मुनिश्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि हमारा देश धर्म प्रधान देश है ।इसमें अनेक प्रकार के संप्रदाय ,मजहब , पंथ और संस्कृति है ।सभी परंपराओं में चार पुरुषार्थ बताए गए हैं, धर्म ,अर्थ ,काम, मोक्ष। जैसे दिशाएं चार हैं, गति चार हैं उसी प्रकार यह पुरुषार्थ भी चार हैं। चारों पुरुषार्थों में धर्म पुरुषार्थ को प्रधानता दी गई है ।मंगलाचरण में आप बोलते ओमकार ,आचार्य श्री को जो बहुत प्रिय था वह मंगलाचरण बार-बार बोलते थे ।ओंकार बिंदु संयुक्तम आचार्य महाराज बार-बार बोलते थे ।बड़े-बड़े योगी भी ओमकार का ध्यान करते हैं ।अंत समय उंकार निकले तो वह काम में आता है। आचार्य श्री उंकारा नमो नमः बोलते थे। वह हमेशा बोलते थे। ओम शब्द के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति होती ।उसके माध्यम से अंतरंग भाव प्रकट होता। आचार्य श्री बोलते है एक अक्षर बोलो सब कार्य हो जाएगा वह है ओम अक्षर। धर्म से लेकर मोक्ष तक चार पुरुषार्थ है। दो पुरुषार्थ अर्थ और काम ,संसार में भटका देते ।जैसे-जैसे मन में विचार होता है, वैसा-वैसा आचार होता चला जाता ।अंतरंग में शुभ परिणाम रखो, हमेशा अच्छा सोचो ,सोच अच्छी रखो, विचार के माध्यम से प्रचार- प्रसार होता रहता है । जैसे विचार मन में रहते, वैसा कार्य होता। मुनि श्री ने एक लकड़हारा का प्रसंग सुनाते हुए अपने प्रवचन को पूर्ण किया।मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज ने रामचरितमानस के प्रसंग को सुनाते हुए प्रवचन दिया।

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