सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैनतीर्थ कुंडलपुर में मुनि श्री शैलसागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि संसार में जितने भी प्राणी हैं वह सब सुख चाहते है। सुख तो चाहते हैं लेकिन दुख को छोड़ना नहीं चाहते ।सुख की इच्छा सभी को है लेकिन दुख के जितने साधन है सभी जोड़कर रखे हुए है ।जब तक दुख के साधन साथ रहेंगे, तब तक सुख मिलना संभव नहीं। व्यक्ति के पास जितने साधन हैं दुख के हैं सुख का साधन एक भी नहीं । पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……
कुंडलपुर ।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैनतीर्थ कुंडलपुर में मुनि श्री शैलसागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि संसार में जितने भी प्राणी हैं वह सब सुख चाहते है। सुख तो चाहते हैं लेकिन दुख को छोड़ना नहीं चाहते ।सुख की इच्छा सभी को है लेकिन दुख के जितने साधन है सभी जोड़कर रखे हुए है ।जब तक दुख के साधन साथ रहेंगे, तब तक सुख मिलना संभव नहीं। व्यक्ति के पास जितने साधन हैं दुख के हैं सुख का साधन एक भी नहीं । कहा जाए कि महाराज के पास पिच्छी कमंडल है, वह क्या सुख का साधन है, वह भी एक प्रकार से दुख का साधन है क्योंकि यह पिच्छी मेरी है यह कमंडल मेरा है ।जहां मेरे तेरे का भाव आएगा ,वहां निश्चय दुख होगा ।पिच्छी को पिच्छी के रूप में, कमंडल को कमंडल के रूप में स्वीकार करते हैं तो दुख की बात नहीं है कि यह मेरा है मेरा जो है वह दुख है दुख के कारण गौण कर दे व्यक्ति तो उसके पास सुख ही सुख हो ।सुख तो चाहते पर दुख के साधनों को दूर नहीं करना चाहते ।
दुख से बचना चाहते हो तो दीक्षा को अंगीकार करो
अब दुख से बचने के लिए आचार्य कुंदकुंद देव ने प्रवचन सार में कहा कि सिद्धों को नमस्कार करो ,दुख से बचना चाहते हो तो दीक्षा को अंगीकार करो। आखिर दीक्षा है क्या ,दीक्षा तो सभी की होती पर दीक्षा का है क्या ,दीक्षा के लिए वस्त्र का त्याग किया जाए कोई जरूरी नहीं है।एक इच्छा पूर्ण हुई, दूसरी शुरू हो जाती है, इच्छाएं रहेगी तब तक दुख ही दुख रहेगा।सुख की प्राप्ति के लिए क्या हमने सुख को प्राप्त किया ।सुख को हमने प्राप्त नहीं किया ,दुख की खोज में दुख को एकत्रित कर लिया। दुख के साधनों को हम एकत्रित करते जाएं तो तीन काल में भी सुख मिलने वाला नहीं है। करना क्या है दुख के जो साधन है एक-एक करके अलग करते जाए, दुख के साधन कौन-कौन से हैं आप स्वयं को देखिए हमने अभी तक त्याग किया है, दान किया है, जो हमारी वस्तुएं नहीं थी वह छोड़ दी और कहा त्याग कर दिया ।त्याग तो जो हमारी थी उसका होता है वस्तु का नहीं। हमारी स्वयं की कौन-कौन सी वस्तुएं थीं और वस्तुएं कौन थी जो वस्तु है सोना -चांदी ,दुकान- मकान हमने इनका त्याग तो कर दिया ,छोड़ दिया, त्याग की बात आती तो त्याग हमने शुरू किया ही नहीं, जिस दिन त्याग शुरू हो जाएगा ,उस दिन सुख के रास्ते खुलते चले जाएंगे। अब त्याग की वस्तुएं कौन सी हैं ,क्रोध ,मान ,माया, लोभ, राग, द्बेष ,मोह यह हमारी स्वयं की वस्तुएं हैं इनका त्याग करना त्याग की बात होती है ।त्याग शुरू कर दिया, जब त्याग शुरू होता तो सुख के साधन मिलते हैं ,हमने जब तक त्याग नहीं किया तब तक सफल नहीं हो सकते। कहना सरल है पर करना कठिन है। हमारे पास कितना राग है कितना द्वेष है कितना मोह है कितना क्रोध है ।जब मान को धक्का लगता है तो क्रोध आता है मान को बस में कर लिया तो क्रोध आ नहीं सकता। मान के ऊपर अंकुश लगाना जरूरी है।













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