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धर्म सभा में दिए प्रवचन : प्रार्थना ही आत्मा की सच्ची खुराक होती है – मुनि अपूर्व सागर जी महाराज


भक्ति का मतलब होता है पूज्य पुरुषों और गुणवान पुरुषों के गुणों का स्मरण करना, याद करना, उनके गुणों का बखान तथा उनके जैसे गुणों को प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही भक्ति कहलाता है। भक्ति में शक्ति होती है। उक्त विचार आचार्य वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य दिगंबर जैन मुनि अपूर्व सागर जी महाराज ने श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर सभागार में आयोजित प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किए। मुनि श्री अर्पित सागर जी महाराज के भी प्रवचन हुए। पढ़िए अशोक कुमार जेतावत की विशेष रिपोर्ट…


धरियावद। भक्ति का मतलब होता है पूज्य पुरुषों और गुणवान पुरुषों के गुणों का स्मरण करना, याद करना, उनके गुणों का बखान तथा उनके जैसे गुणों को प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही भक्ति कहलाता है। भक्ति में शक्ति होती है। उक्त विचार आचार्य वर्द्धमान सागर जी महाराज के शिष्य दिगंबर जैन मुनि अपूर्व सागर जी महाराज ने श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर सभागार में आयोजित प्रातःकालीन प्रवचन सभा में व्यक्त किए। मुनि श्री अपूर्व सागर जी महाराज ने कहा कि वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली होता है, जिसके पास पैसा आए और अहंकार न आए तथा ज्ञान आ जाए और अहंकार न आए इसकी व्याख्या एक कथानक सुना स्पष्ट की।

महाराज श्री दक्षिण भारत के तीर्थ गोम्मटेश बाहुबली भगवान की प्रतिमा के संस्थापक राजा चामुंडराय और गरीब बुढ़िया (गुल्लिका अज्जि) का उदाहरण देकर बताया कि भगवान बाहुबली की प्रतिमा पर राजा द्वारा घड़े भर-भरकर अभिषेक किया जा रहा था। लेकिन वह नाभि स्थल से नीचे नहीं आ रहा था। क्योंकि राजा अहंकार से भरा था। वहीं, गरीब बुढ़िया (गुल्लिका अज्जि) जो श्रद्धा, विश्वास और भक्ति से भरी थी, उसके एक लोटे जल से अभिषेक करने पर पूरी प्रतिमा का अभिषेक होकर नीचे पैरों में अंगूठे तक आ गया। वही कहावत प्रसिद्ध हो गई कि एक बुढ़िया की लुटिया गजब कर गई। अतः श्रद्धा व विश्वास हो तो भक्ति का फल मिल जाता है। इसलिए तो कहा है कि प्रार्थना आत्मा की पुकार होती है और प्रार्थना आत्मा की खुराक होती है।

धर्म करने से मिलता है सुख

इसके पूर्व धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिगंबर जैन मुनि श्री अर्पित सागर जी महाराज की इच्छाओं को कम करना ही धर्म है। मुनिश्री ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार के दुखों से छुड़ा कर जो उत्तम सुख में पहुंचा दे, वह धर्म है। धर्म करने में शाश्वत सुख मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो धर्म नहीं करते हैं, उन नर और तिर्यंच में क्या अंतर है? अर्थात कुछ भी अंतर नहीं रहता है। वात्सल्य वारिधि दिगंबर जैनाचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के संघस्थ शिष्य युगल मुनि श्री अपूर्व सागर जी महाराज, मुनि श्री अर्पित सागर जी महारा, क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज संघस्थ ब्रह्मचारी नमन भैया, सुरेंद्र कुमार जी जैन (नाना जी) और अन्य त्यागी व्रती श्रावक धरियावद नगर के चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर के रत्नत्रय भवन में विराजमान हैं।

मुनि संघ सान्निध्य में कई धार्मिक कार्यक्रमों का प्रतिदिन आयोजन चल रहा है और अभूतपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है। इसमें प्रतिदिन प्रातः स्वाध्याय, श्रीजी का जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन, प्रवचन सभा, आहारचर्या, दोपहर में संघ का स्वाध्याय, सांयकाल में कक्षा शिक्षण, आरती भक्ति, प्रश्नमंच, रात्रि में वैयावृत्ति और भजन संध्या का धर्म प्रभावनापूर्व आयोजन चल रहा है। इसमें वृद्ध, बालक, नन्हें-मुन्हें, युवक-युवतियां और श्रावक-श्राविकाएं उत्साह से भाग लेकर पुण्यार्जन कर रहे हैं।

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