आज समाज को ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो समाज को बांटें नहीं, उसे जोड़ सके। वह साधु वर्ग को भी एकजुटता का संदेश दे क्योंकि हमारे समाज में बहुत सारे वर्ग हैं… तेरापंथ, 20 पंथ, पोरवाल, परवार आदि। अगर कोई एक व्यक्ति ऐसा हो, जो इन सभी को साथ लेकर चल सके तो समाज का बहुत बड़ा उत्थान होगा।
श्री रविंद्रकीर्ति स्वामी,
पीठाधीश जम्बूद्वीप, हस्तिनापुर
मैं श्रीफल जैन न्यूज के इस विचार से पूरी तरह से सहमत हूं कि एक पद, एक व्यक्ति, एक संस्था होना चाहिए। जैसे अलग-अलग मंदिर होते हैं तो उसमें समाज का नेतृत्व करने के लिए वहां एक कमेटी बनानी पड़ती है। उस कमेटी में वह व्यक्ति अध्यक्ष होता है या उपाध्यक्ष होता है या महामंत्री होता है तो उसे अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
वहां वह समाज का नेतृत्व करता है, अपनी कॉलोनी का नेतृत्व करता है, वहां साधु संघ आता है तो उसकी सारी व्यवस्थाएं करना उसका कर्तव्य होता है। समाज के जो भी कार्यक्रम होते हैं, उन सबको देखना होता है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर वह व्यक्ति अनेक संस्थाओं के पदों पर अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा सकता। लेकिन वही व्यक्ति राज्य या अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्था में है तो यह चल सकता है। वर्ष 1974 में एक महासभा समिति बनाई गई थी, उसमें जो अध्यक्ष थे, उन्होंने दूसरी समितियों में अपने पद को नहीं छोड़ा।
न ही दूसरी समितियों का उस महासभा समिति में विलय हुआ। इससे काम प्रभावित हुए। आज समाज को ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो समाज को बांटें नहीं, उसे जोड़ सके। वह साधु वर्ग को भी एकजुटता का संदेश दे क्योंकि हमारे समाज में बहुत सारे वर्ग हैं… तेरापंथ, 20 पंथ, पोरवाल, परवार आदि। अगर कोई एक व्यक्ति ऐसा हो, जो इन सभी को साथ लेकर चल सके तो समाज का बहुत बड़ा उत्थान होगा।













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