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जगत के स्वामी वीतरागी सिद्ध महाप्रभु श्रीराम भगवान : जैन रामायण


संसार के बड़े बड़े देशो में रामायण का प्रचलन है जैन रामायण, हिन्दू रामायण, बुद्ध रामायण इत्यादि। हिन्दू रामायण की कहानी सब जानते हैं, लेकिन तीर्थंकर भगवान ने जो रामायण की स्टोरी बताई है वो हम लोगो को नहीं पता। सौरभ जैन वरेह वाले का ये आलेख आपके सामने है, जिसमें जैन रामायण का संक्षिप्त विवरण है । जैनों की मान्यता नुसार 63 शलाका महापुरुषों में 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 बलभद्र, 9 नारायण और 9 प्रतिनारायण होते हैं। बलभद्र और नारायण भाई-भाई होते हैं और प्रतिनारायण 3 खंड का मालिक अर्द्धचक्री सम्राट होता है। नारायण अर्द्धचक्री सम्राट प्रतिनारायण को युद्ध में पराजित कर स्वयं अर्द्धचक्री सम्राट बनते हैं। यह प्रकृतिजन्य शाश्वत नियम है। इस अवसर्पिणी काल के आठवे बलभद्र राम थे, आठवे नारायण लक्ष्मण थे और आठवे प्रतिनारायण रावण थे।


20 वे तीर्थकर श्री मुनिसुव्रतनाथजी के काल में जन्म लेनेवाले राम और लक्ष्मण अयोध्या के इक्ष्वाकुवंशी अर्थात सूर्यवंशी राजा दशरथ के पुत्र थे। राजा दशरथके अतिशय पराक्रमी दादा राजा रघु के नाम पर इक्ष्वाकुवंश का नाम रघुवंश पड़ा।

राजा दशरथ की चार पत्नियां थीं- अपराजिता (कौशल्या), सुमित्रा, कैकेई और सुप्रभा, जिन्होंने राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न इन चार पुत्रों को जन्म दिया था। सम्यग्दृष्टि परम वैभवशाली राजा दशरथ अपने राज्य को तृण समान मानते थे।

एक दिन रानी कौशल्या ने प्रातःकाल चार स्वप्न देखें- (1) उज्ज्वल हाथी, (2) केसरी सिंह, (3) सूर्य और (4) सर्वकला पूर्ण चंद्रमा। राजा दशरथ ने स्वप्नों का फल बताते हुये कहा कि रानी कौशल्या को अंतर्बाह्य शत्रुओं को जीतने वाला महापराक्रमी, पुण्यशाली और मोक्षगामी पुत्र होगा।

चैत्र शुक्ल नवमी के दिन कौशल्या ने कमल के समान नेत्र वाले पुत्र राम को जन्म दिया। राजा दशरथ ने राम के जन्म का बहुत उत्सव किया, गरीबों को दान दिया।

“जिन” शब्द का प्रयोग करते है श्री राम और कहते है, “हे गुरुवर… मैं वो राम नहीं हूँ जिसको प्रजा राम राम बुलाती है और अब मेरी वांछा भी नहीं, अब मैं मर्यादा पुरुषोतम के सत्कार को, अयोध्या नरेश के सम्मान को, और सारे वैभव को नहीं चाहता, और सांसारिक सुखो में भी मेरा मन नहीं लगता और अब मैं तो अपने ही स्वरुप में रम जाना चाहते हूँ.. जिस राम में योगी रमण करते है उसी राम में मैं रम जाना चाहता हूँ… जिस प्रकार जिन अपने भीतर के राम में रम जाते है उसी प्रकार उस शुद्ध आत्मा राम में रम जाना चाहता हूँ। “ये जिन शब्द को प्रयोग महर्षि बाल्मीकि ने अपनी रामायण में किया है।

जब इस भारत भूमि में कर्म भूमि की शुरुआत हुई तब आदि-ब्रम्हा (तीर्थंकर आदिनाथ) इस धरती के पालनहार हुए, और उन्होंने जनता को जीवन जीने की कला सिखलाई, 20 वें तीर्थंकर’ मुनिसुव्रत नाथ’ के शासन काल में ये राम, रावण, हनुमान आदि हुए, श्री राम का जन्म का नाम पद्म है, किन्तु वे राम के नाम से जाने जाते है और जैन रामायण जिसका नाम “पदमपुराण” है, रूस में भी रामायण का प्रचलन है, संसार के बड़े बड़े देशो में रामायण का प्रचलन है जैन रामायण, हिन्दू रामायण, बुद्ध रामायण इत्यादि..।. हम लोगो को हिन्दू रामायण तो सब पता है लेकिन तीर्थंकर भगवान ने जो रामायण की स्टोरी बताई है वो हम लोगो को नहीं पता !!

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की उम्र 17000 वर्ष तथा शरीर की ऊंचाई 16 धनुष और वे मांगी-तुंगी से मोक्ष गये! ये पर्वत बहुत ही पवित्र है यहाँ से श्री राम के साथ साथ हनुमान, सुग्रीव, नल, नील, महानील, गवा, गवाख्य इत्यादि रामायण के पात्र मोक्ष पधारे, इस तरह यहाँ से 99 करोड़ जीवो ने मुक्ति प्राप्त की है, इस क्षेत्र पर 2 पहाड़ मांगी और तुंगी होने के कारण ही इस जगह का नाम मांगी-तुंगी है।

रावण ने एक पराई स्त्री सीता का अपहरण किया और उनको अपनी पटरानी बनाना चाहा । जब रावण बहुत सारी विद्या प्राप्त करके दिग्विजय करने के लिए निकलता है तो बहुत राजाओ को हराता हुआ चलता है और इस विजययात्रा में रावण नलकूबर की स्त्री का प्रेमप्रस्ताव को ठुकराकर अपने को ऊँचा उठाता है और केवली भगवान् का उपदेश सुनकर प्रतिज्ञा करता है की मैं उस परनारी का उपभोग नहीं करूँगा जो स्वयं मुझे नहीं चाहेगी और दूसरी बड़ी बात जब श्री राम हनुमान जी को लंका भेजते है की सीता का समाचार लाओ वो कैसी है तब हनुमान जाते है वहा पर बन्दर का रूप बनाकर और लंका में जो उत्पात मचाते है वो तो सबको पता है और रावण के राजमहल की छत को एक लात मरते है और वो छत समुद्र में जाकर गिर जाती है फिर लोट कर आते है और राम को बोलते है आपकी सीता पवित्र और निष्कलंक है तब राम बोलते है ऐसा कैसे संभव है वो रावण सीता को ले गया फिर भी सीता निष्कलंक तब हनुमान जी, सुघ्रीव, इत्यादि लोग थोडा सा हँसते है और बोलते है “रावण विधाधर है उसकी आकाशगामिनी विद्या- नष्ट हो जाती अगर वो सीता को छूने की कोशिश भी करता”

“सती सीता का संबोधन राम के लिए” राम द्वारा त्यागे जाने पर भी सती सीता सेनापति कृतान्त्वक्र से राम को सन्देश देने के लिए कहती है की “हे प्रिय राम, जिस प्रकार से आपने लोकापवाद के भय से मुझे त्याग दिया उसी प्रकार कभी भी लोकापवाद के भय से जिन धर्म को न त्याग देना क्योंकि इस पापी संसार में तो परम पवित्र जिन धर्म के द्वेषी भी बहुत है और वो मुक्तिके सोपान जैसे जिनधर्म की भी निंदा करने से पीछे नहीं हटेगे।

मुझे त्यागने से तो आपका अधिक से अधिक एक भव बिगड़ेगा परन्तु अगर आपने जिन धर्म को त्याग दिया तो आपके कई भव बिगड़ जायेगे”

जब सीता के दो पुत्र लव और कुश ह हो जाते ते है तब कुछ कुछ समय बाद सीता को अग्नि परीक्षा देनी होती है क्योकि राज्य, जनता आदि के कारण से राम ने सीता जो को त्याग दिया था… जिसमे वो सफल होती है। लेकिन ये सब कार्य सीता के लिए वैराग्य का कारण बन जाती है और सीता आर्यिका पृथ्वीमति माता जी के पास दीक्षा ले लेती है, अब हिन्दू रामायण में आया है की सीता पृथ्वी में समा जाती है और सिर्फ बाल ही बचते है और अपने यहाँ पृथ्वीमति माता कितना मैच करता है… सीता जी ने पृथ्वीमाता जी को अपने को समर्पित कर दिया था वो उसमे समा गयी थी… और केशलोंच करने के कारण सिर्फ बाल ही बचे !!

जब रावण का अंत समय आ गया था तो श्री राम लक्ष्मण से बोलते है, “जाओ रावण के पास जाओ और उसने कुछ उपदेश ग्रहण करो।” तब लक्ष्मण जाते और रावण को बोलते है “मेरे बड़े भैया ने बोला है की आपसे कोई उपदेश ले तो आप मुझे उपदेश दीजिये।” तो रावण कोई उत्तर नहीं देते तो लक्ष्मण वापस आ जाते है और राम पूछते है, “कोई उपदेश नहीं लिया ? “तब राम पूछते है, “तुम कहा खड़े थे..? लक्ष्मण बोलते है,” रावण के सिर की तरफ। “तो राम बोलते है,” जिससे शिक्षा लेनी होती है उनके चरणों में खड़ा होना पड़ता है…. और जाओ उनसे उपदेश ग्रहण करो..। “फिर रावण राम से क्षमा याचना करते है और लक्ष्मण को जीवन के अनमोल सूत्र बताते है…

जब लक्ष्मण का’ आकस्मिक निधन हो गया तो राम छोटे भाई के विछोह में 6 महीने तक दुःख करते रहे। उनके मोह में अपना भान भूल बैठे। फिर सेनापति देव के द्वारा समझाए जाने पर संयम स्वीकार किया। श्री राम जब दीक्षा लेकर तप करने लगे क्षपक-श्रेणी चढ़ने लगे तब सीतेंद्र (महासती’ सीता’ का जीव जो संयम लेकर 14 वें देवलोक का स्वामी हुआ था) ने वहाँ आकर मोहक, कामुक और आकर्षक दृश्यों की विकूवर्ना की। सीतेंद्र चाहता था कि राम मोक्ष न जाकर स्वर्ग आ जाएँ तो हम मित्र बन जाएँ, पर ‘श्री राम’ अविचल रहे। केवल ज्ञान प्राप्त किया। 17000 वर्ष की आयु में’ श्री राम’ ने निर्वाण प्राप्त किया।

हम लोग रामायण की बात करते है। रावण तो राम से भी दस कदम आगे का काम करने वाले है। राम हलधर थे, वो रावण का जीव तीर्थंकर होगा, और सीता का जीव गणधर होगा। जितना महा-संग्राम दोनों ने मिलकर किया था, उससे कही अधिक शांति धरती पर करके मोक्ष चले जायेंगे, लक्षमण का जीव भी तीर्थकर बनेगा, रावण की broadcasting करने सीता का जीव गणधर बनकर बैठेगा, अब सोचिये ।भव भव का बैर कहा चला गया, व्यक्ति अतीत की और तथा आने वाले कल की और नहीं देखता.. बस उसके मन में वर्तमान की प्रयाए रह जाती है, कितना सुन्दर सीन होना जब रावण तीर्थंकर होना, सीता गणधर और रामायण का द्रश्य अतीत हो जायेगा… इस प्रकार की घटनाएं भुतकाल में अनंत हो गयी है और भविष्य काल में भी होगी !

एक बार ऐसा हुआ की बाली ने नियम लिया हुआ था की “मैं किसी के पराधीनता स्वीकार नहीं करूँगा।” और जब रावण ने बोला की “अपने को मुझे समर्पण करे अपना राज्य “तो बाली ने नहीं किया। फिर समय व्यतीत होने पर जब बाली ने मुनि दीक्षा धारण करली तो एक बार रावण जा रहा था तो उसका विमान रुक गया उसने सोचा मेरा विमान क्यों रुका ? तो देखता है की ये तो वही बाली है और मुनि तपस्या कर रहा है। लेकिन इनका बैर अभी तक नहीं गया जो मेरा विमान रोक दिया जबकि विमान मुनिराज के प्रभाव से अपने आप रुका था तो रावण ने कैलाश पर्वत को उठा लिया और सोचा की फेक देता हूँ, फिर बाली मुनिराज ने देखा की इसने ये पर्वत जिसपर मैं तपस्या कर रहा हु उठा लिया है तो उस पर्वत पर जो जीव, जानवर, पशु थे उनकी रक्षा के लिए अपने पैर के अंगूठे को दबादिया और रावण रोने लगा फिर रावण की पत्नी ने प्रार्थना की तो महाराज जी ने छोड़ दिया।

राम कोन थे जिन्होंने बरसो तपस्या करने के फल स्वरुप ये राम का पद पाया था… और अंत समय में दिगंबर दीक्षा लेकर मोक्ष चले गए…. लेकिन देखने वाली बात ये है की हिन्दू धर्म में आपको राजा राम का रूप मिलेगा और जिनेन्द्र प्रणित धर्म में आपको दिगम्बर मुद्राधारी वीतरागी राम का रूप मिलेगा… उनके जीवन में हर जगह मर्यादा से काम किया इसलिए उन्हें “मर्यादा पुरुषोतम श्री राम” जो मर्यादा में रहे अपने को संयम में रखे, जो पुरुषो में उत्तम अर्थात महान जीवन है

जिनका और जो राम अर्थात भगवान आत्मा है…”हे राम बसों घट माहि !!” राजा दशरथ, श्री राम, लक्ष्मण ये सब रघुवंश के थे इनके वंश में बड़े बड़े राजा हुए और सब मर्यादा के धारक थे कहा भी गया है “रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन न जाये”

हनुमान, सुघ्रीव, नल, नील, महानील, गवा, गवाख्य ये कौन थे ? – ये विद्याधर और बड़े बलशाली थे। सही में ये बन्दर (वानर) नहीं बल्कि विद्याधर थे जिसका अर्थ है की इनमे कोई भी रूप बनाने की शक्ति थी और इनके वंश का नाम वानरवंश था और इनके ध्वज का चिन्ह भी बन्दर थे, लेकिन समय के साथ लोग इनके सही रूप को न समझने के कारन इनको बन्दर मानने लगे, जीवन के अंत में इन्होने दिगंबर दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त किया, सोचने वाली बात है।

रावण, मेघनाथ, कुम्भकर्ण – ये कौन थे ? इनके वंश का नाम राक्षशवंश था। वास्तव में ये राक्षस नहीं थे और राक्षस द्वीप पर रहते थे, जैन धर्म को मानने वाले तीर्थंकर के भक्त थे।

क्या रावण के दस मुख थे। नहीं । बचपन में जब रावण खेल रहा था तो इनके गले में पड़ी हुई नो रत्नों की माला में इनके नो मुख दिखाई दिए और इनका नाम दशानन हो गया…।

रावण ने बहुत तपस्या की थी और और पूर्व कर्म का ऐसा उदय आया की ऐसे युद्ध हुआ और उन्हें नरक जाना पड़ा और ये सब शाकाहारी थे, मांसाहार का तो सेवन सोच भी नहीं सकते थे। रावण शांतिनाथ भगवन के बहुत बड़े भक्त थे, एक बार भक्ति करते हुए वीणा (एक बैंड) बजाते हुए वीणा के तार टूट गए तो इन्होने अपने हाथ की नाडी निकाल ली और भक्ति करने लगे, अभी तो नरक में है रावण, भविष्य में तीर्थंकर बनेंगे।

पर रावण का चरित्र अपने आप में एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व है। रावण सब कलाओं में पारंगत और ज्ञानी था।अंततः लक्ष्मण रावण को मारता है।अंत में, राम, जो एक ईमानदार जीवन जीते हैं, राज्य त्याग के बाद, एक जैन साधु बन जाते हैं और मोक्ष पा लेते है.. दूसरी ओर, लक्ष्मण और रावण नरक में जाते हैं।हालांकि यह भविष्यवाणी भी है कि अंततः वे दोनों ईमानदार व्यक्ति के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और उनके भविष्य के जन्म में मुक्ति प्राप्त हो जाएंगी रामायण में भी भगवान राम किसी न किसी रूप में रावण की विद्वता के कायल हैं।

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