दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष महेंद्र संध्या नायक जैन की पुत्री बाल ब्रह्मचारिणी शिवा सहित चार बहनों की सोमवार को बिनौली यात्रा निकाली गई, जो कस्बे के नया जैन मंदिर से प्रारंभ होकर मुख मार्गों से निकली। यहां जैन समाज के श्रद्धालुओं ने उनकी गोद भराई की। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…
ललितपुर/बानपुर।दिगंबर जैन समाज के अध्यक्ष महेंद्र संध्या नायक जैन की पुत्री बाल ब्रह्मचारिणी शिवा सहित चार बहनों की सोमवार को बिनौली यात्रा निकाली गई, जो कस्बे के नया जैन मंदिर से प्रारंभ होकर मुख मार्गों से निकली। यहां जैन समाज के श्रद्धालुओं ने उनकी गोद भराई की। शोभायात्रा बड़ा जैन मंदिर पर संपन्न हुई। सर्वप्रथम सुबह आठ बजे हल्दी-चंदन का कार्यक्रम संत भवन में हुआ। इसके उपरांत दीक्षार्थी बहिनों द्वारा दोपहर दो बजे श्री नया मंदिर जी के प्रांगण में धर्म सभा में को संबोधन किया गया।
वैराग्य उत्पन्न होने के बारे में बताया
धर्म सभा में उपस्थित लोगों को चारों बहनों ने उन सभी को कैसे वैराग्य कैसे उत्पन्न हुआ, उसके बारे में अपने-अपने संस्मरण सुनाए। शिवा दीदी ने अपने संस्मरण में कहा कि आज से 12 वर्ष से पहले माता श्री 105 विशाश्री जी का सानिध्य हमें टीकमगढ़ बानपुर में प्राप्त हुआ था। उसके बाद हमारे मन में एक ही भावना जगी थी और उन्हीं के साथ में इन 12 वर्षों में साथ रही, जो सानिध्य,प्यार, वात्सल्य उनका मुझे मिला, उसका मैं कभी उपकार नहीं भूल पाऊंगी, न ही उपकार चुका पाऊंगी। माताजी जब बानपुर पंचकल्याणक आई थीं, तब मेरी उम्र 21 वर्ष की थी। तब से लेकर आज तक हमने माता जी के सानिध्य में रहकर अपने वैराग्य को प्रशस्त किया और आज हम जिन धर्म के अनुसार अपना मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। शादी तो दुखों का मार्ग है, दीक्षा सुख का मार्ग है। हमें इस असार संसार से परिभ्रमण से कैसे मुक्ति मिले, मुक्ति का तो एक ही मार्ग है वह जैन धर्म। इसलिए हम सभी बहनें इस मार्ग पर चलने के लिए दीक्षा ले रही हैं। हमें शाश्वत सुख प्राप्त करना है तो यह उत्तम तप, उत्तम संयम, उत्तम प्रभु की आराधना के बिना हमें नहीं मिल सकता है। इस दुर्लभ संसार में उत्तम जैन कुल व जिन धर्म बहुत उत्तम बोधि का हमें मिलना बहुत कठिन है परंतु हमें यह सभी मिला है। हम इसे सार्थक करना चाहते हैं।
आत्मा के सार्थकता योगों में
इसी प्रकार बाल ब्रह्मचारिणी दीदी रौनक हिंगोनिया राजस्थान, शैली भिंड, सपना सलेमपुर भोपाल, वक्रखंर दीदी ने कहा कि यह जीव 84 योनियों से भटकता आ है। कभी इस जीव ने अपनी आत्मा का कल्याण नहीं किया और न ही आत्मा की पहचान कर पाई। आत्मा की सार्थकता भोगों में नहीं, योगों में है। अंत में मुनि श्री गणेश सागर जी महाराज ने कहा कि गुरु दीक्षा देते हैं। दीक्षा का मतलब दुखों से मुक्त हो जाना है। संसार शरीर से विरक्त हो जाना। चतुर्थ काल जैसा इस समय नहीं है फिर भी दीक्षाएं हो रही हैं। दीक्षा लेना कोई साधारण बात नहीं। मन की प्रवृत्ति को रोकना होता है। गुरु दीक्षा तो देते हैं परंतु गुणस्थान नहीं देते गुणस्थान स्वयं को बनाना होता है।
शोभायात्रा निकाली गई
अंत में मुनि श्री विनत सागर व मुनि श्री विश्वकुन्द जी ने सभी दीक्षार्थी बहनों को मंगल आशीर्वाद दिया। दीक्षा लेने के बाद भगवान बनने की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। इसके पूर्व मुनि श्री विनत सागर जी महाराज की अष्ट द्रव्य से पूजा की गई। बाहर से पधारे महानुभावों ने मुनि द्वय के चरणों में श्रीफल अर्पित किए। इसके बाद शाम को 7:00 बजे गोद भराई का कार्यक्रम हुआ, जिसमें पधारे सभी नाते रिश्तेदार व नगर की समाज जन अन्य लोगों ने गोद भराई की। ठीक 8:00 बजे बिनौली शोभायात्रा श्री दिगंबर जैन नया मंदिर से प्रारंभ हुई, जो नगर के मुख्य बाजार बस स्टैंड से वापस शील चौराहे एवं बड़ा जैन मंदिर जी पर संपन्न हुई। इस अवसर पर नगर को तोरण द्वारों व लाइट डेकोरेशन से सजाया गया था। जैन समाज की बालिकाओं द्वारा घर के सामने आकर्षक रंगोली बनाई गई। शोभायात्रा में सभी चार दीक्षार्थी बहनों को बग्घियों में बैठाया गया। सबसे आगे डीजे पर मधुर भजनों और ढोल नगाड़ों पर नृत्य भी किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में नगरवासी, क्षेत्रवासी, समाज जन, रिश्तेदार, जैन समाज की महिलाएं, पुरुष व बच्चे उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन संजय संजू कुमकुम साड़ी वाले टीकमगढ़ ने किया।













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