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स्मृति नगर स्थित श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर में बारह भावना पर प्रवचन : शरीर की क्षमता को पहचान कर तप करें – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज


अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बारह भावना प्रवचन श्रृंखला में दसवें दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कर्म के आने से रुक जाना संवर और बंधे हुए कर्मों का निकल जाना निर्जरा है। आकुलता से कर्म बंधता है और निराकुलता से कर्म की निर्जरा होती है। राग होने पर आकुलता आती है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में बारह भावना प्रवचन श्रृंखला के दसवें दिन निर्जरा भावना पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि कर्म के आने से रुक जाना संवर और बंधे हुए कर्मों का निकल जाना निर्जरा है। आकुलता से कर्म बंधता है और निराकुलता से कर्म की निर्जरा होती है। राग होने पर आकुलता आती है और राग रहित होने पर निराकुलता होती है।

निराकुल व्यक्ति ही सुखी होता है और परमात्मा बन जाता है। जिनेन्द्र भगवान की पूजा आदि धार्मिक क्रिया में अगर आकुलता है तो वहां कर्म का ही बंध होगा। जीवन में जो भी कार्य करें, उसमें आकुलता नहीं होनी चाहिए। सुख और दुख दोनों ही अवस्था में समता रखने से ही निर्जरा होगी और सुख की प्राप्ति भी। कर्म की निर्जरा तप से होती है। तप करते समय भी आकुलता नहीं होनी चाहिए।

शरीर की क्षमता को पहचान कर तप करना चाहिए और तुम्हें शरीर की शक्ति कम लगे तो उसे धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। जिसका भी संयोग से मिला, उसमें संतुष्टि रखें। अधिक की इच्छा न करें। किसी भी गति में चले जाने पर भी शाश्वत सुख नहीं मिलेगा। सुख-दुख दोनों आते-जाते रहते हैं। जितना पैसा हो, उतना ही दान करें। उधार लेकर दान न करें। उधार लेकर दिया गया दान आकुलता का कारण होगा और वहां पर बंध ही होगा।

जो पर्याय मिले, उसमें छोड़ें आकुलता

मुनि श्री ने एक कहानी के जरिए भी समझाया। उन्होंने कहा कि एक बार एक चूहा बड़ा परेशान था। वह शंकर जी के पास गया और कहने लगा मुझे श्वान से डर लगता है कि वह मुझे खा न जाए, भगवान ने उसे श्वान बना दिया। इसी प्रकार श्वान से चीता, सिंह और मनुष्य भी बना। अब भी हर पर्याय में उसे मरने का डर था। वह वापस शंकर जी के पास आया और बोला कि मुझे वापस चूहा ही बना दो क्यों मरण का डर तो सभी पर्याय में है। जो पर्याय जितनी मिली है, उसमें मुझे ही आकुलता को छोड़ना होगा और बंध से बचते हुए निर्जरा करनी होगी। तभी शाश्वत सुख की प्राप्ति होगी। धर्म सभा में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज जी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन ब्र. अजय भैया ने किया।

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