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धर्मसभा को संबोधित कर व्यक्त किए उदगार : माता-पिता के प्रतिकूल न चलें- मुनि श्री सुधासागर महाराज


निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव तीर्थ चक्रवर्ती108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि महान बनना है तो एक बार दुश्मन से प्रशंसा सुनकर मरना। जानते हैं उनके प्रवचनों को विस्तृत रूप से…


आगरा। निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव तीर्थ चक्रवर्ती108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि महान बनना है तो एक बार दुश्मन से प्रशंसा सुनकर मरना। जानते हैं उन्होंने प्रवचन में क्या कहा…

1.दुश्मन सम्मान करे-सर्वनाश करने वाला दुश्मन ने आपकी प्रशंसा की, एक बार दुश्मन से प्रशंसा सुनकर मरना, यदि दुश्मन पक्ष हमारा समर्थन कर रहा है तो वह हमारी प्रशंसा है। यदि विपक्ष ने मुझे चुना है तो मुझे निष्पक्ष रहना है। वह अपने बेटे को सजा देगा विपक्ष वाले बेटे को सजा से बचा लेगा, हर व्यक्ति को अपने निंद‌कों का विश्वास समर्थन जीतना है। तो वह सर्वश्रेष्ठ हैं

2.जाति की इज्जत-हमें अपनी जाति की इज्जत बचाने के लिए रात्रि भोजन मत करना,चाहे तो भूख से मर जाना लेकिन रात्रि में भोजन नहीं करना चाहे कमरे में बंद होकर भोजन कर लेना सारा विश्व जानता है कि जैनी कैसा होता है, वैसा हमको करना है।

3.सुधर नहीं पा रहे-अच्छा आदमी बनने को बहुत मेहनत करनी पड़ती है। अच्छा आदमी बनने के लिए भगवान को भी लगना पड़ता है। गुरु को भी अच्छा आदमी बनाने के लिए लगाना पड़ता है। सब कुछ अच्छा होगा फिर कि आदमी अच्छा बन जाये कोई जरूरी नहीं। मारीच के जीव के उदाहरण से महाराज जी ने बताया, मारीच जैसे पुण्यात्मा जीव मिला फिर भी नहीं सुधर रहा है। सब कुछ अच्छा मिला भारत जैन धर्म, गुरु भगवान फिर भी हम सुधर नहीं जा रहे हैं।

4.किस्मत-किस्मत ह‌मारी अच्छी है। कर्म अच्छा है अच्छा इंसान होना मिला, जन्म किस्मत से, माता पिता किस्मत से मिले, हमें उनके प्रतिकूल नहीं चलना है। कर्म ने हमारी किस्मत में झांटकर हमें यहां जन्म दिया है। हमें अच्छे माता-पिता मिले, हमें किस्मत से जैन धर्म मिला। दुश्मन भी हमारे में गुण देखे।

-संकलन ब्र. महावीर

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