जैन दर्शन में जैसे तीर्थंकर भगवंतों की जन्म जयंती मनाते है, वैसे ही श्रुत पंचमी का महापर्व मनाया जाता है। श्रुत पंचमी को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश भाषा के हस्तलिखित प्राचीन शास्त्रों को भगवान की वेदी के पास स्थापित कर उनकी आवरण की साज-सज्जा कर पूजन किया जाता है। पढ़िए श्रुत पंचमी महापर्व क्यों मनाया जाता है, इसके बारे में मनीष विद्यार्थी की यह विशेष रिपोर्ट…
शाहगढ़। जैन दर्शन में जैसे तीर्थंकर भगवंतों की जन्म जयंती मनाते है, वैसे ही श्रुत पंचमी का महापर्व मनाया जाता है । इस दिन को जिनवाणी उन्नयन के रूप में भी मनाते हैं। श्रुत पंचमी को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश भाषा के हस्तलिखित प्राचीन शास्त्रों को भगवान की वेदी के पास स्थापित कर उनकी आवरण की साज-सज्जा कर पूजन किया जाता है। जिनवाणी शोभायात्रा निकाली जाती है। श्रुत पंचमी पर्व पर सेमिनार आयोजित किये जाते हैं, अप्रकाशित शास्त्रों को दानदाताओं के सहयोग से प्रकाशित करने की योजनाएं बनाई जाती हैं। इस दिवस को देशभर में जिनवाणी जयंती की तरह मनाते हैं ।
इस दिन जिन शास्त्रों का लिपिबद्ध किया थ
श्रुत पंचमी के दिन जिन शास्त्रों को लिपिबद्ध करने का कार्य पूर्ण हुआ था। यह पर्व ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ‘श्रुत पंचमी का पर्व के नाम से मनाया जाता है। श्रुत पंचमी को तीर्थंकर महावीर के द्वारा कही वाणी को पहली बार लिपिबद्ध किया था। पहले तीर्थंकर केवल उपदेश देते थे ,जिसे उनके प्रमुख शिष्य (गणधर)सभी को समझाते थे, क्योंकि तब तीर्थंकरों की वाणी को लिखने की परंपरा नहीं थी। उसे सुनकर ही स्मरण किया जाता था। इसलिए उसका नाम ‘श्रुत’ था।
भगवान महावीर की दिव्यध्वनि से मिला ज्ञान
जैन धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है। भगवान महावीर की दिव्यध्वनि के माध्यम से जो ज्ञान गणधर को प्राप्त हुआ, उसे श्रुत परंपरा के अंतर्गत अनेक आचार्यों ने जीवित रखा। लेकिन गुजरात के गिरनार पर्वत की चन्द्र गुफा में परम पूज्य धरसेनाचार्य ने ध्यान में विचार किया कि हमने जो ज्ञान अर्जन किया है वह हमारी समाधि के बाद समाप्त हो जाएगा । क्योंकि धीरे-धीरे लोगों की स्मरण शक्ति क्षीण होती जा रही है । हमारे पास स्मरण में जितना ज्ञान है उसको लिपिबद्ध करने की आवश्यकता है। उन्होंने आचार्य श्री पुष्पदंत एवं आचार्य श्री भूतबलि मुनियों को सैद्धांतिक देशना दी, जिसे सुनने के बाद द्वय मुनियों ने षट्खंड़ागम ग्रंथ लिपिबद्ध किया, जो ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को पूर्ण हुआ ।
णमोकार महामंत्र से षटखंडागम की पूजा
यह 2000 वर्ष पहले की बात है इस शुभ मंगलमयी अवसर पर अनेक देवी-देवताओं ने णमोकार महामंत्र से ‘षटखंडागम’ की पूजा की थी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इस दिन से श्रुत परंपरा को लिपिबद्ध परंपरा के रूप में प्रारंभ किया गया। उस ग्रंथ को ‘षटखंडागम’ के नाम से जाना जाता है। इसलिए यह दिवस श्रुत पंचमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन जैन धर्मावलंबी पीले वस्त्र धारण करके जिनवाणी की शोभा यात्रा निकालकर पर्व को मनाते हैं, साथ ही अप्रकाशित दुर्लभ ग्रंथों/ शास्त्रों को प्रकाशित करने के उद्देश्य से समाज के लोग यथाशक्ति दान देकर इस परंपरा का निर्वहन करते हैं।













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