चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) के सफल करियर को त्यागकर दिगम्बर मुनि बने मुनिश्री 108 विकौशल सागर जी महाराज आज तप, संयम और आत्मसाधना की प्रेरणा बन चुके हैं। 1400 से अधिक निर्जल उपवास उनकी तपशक्ति का अनुपम उदाहरण हैं। पढ़िए ललितपुर से श्रीफल साथी राजीव सिंघई की विशेष स्टोरी ।
कल्पना कीजिए... एक युवा, जिसने कठिन परिश्रम से चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा उत्तीर्ण की हो। कॉरपोरेट जगत में शानदार करियर, सुख-सुविधाएँ और करोड़ों रुपये कमाने की संभावनाएँ उसके सामने हों। लेकिन एक दिन गुरु के दर्शन होते हैं और उसी क्षण जीवन की दिशा बदल जाती है। वह सब कुछ छोड़कर आत्मसंयम, तप और वैराग्य का मार्ग चुन लेता है।
यह किसी उपन्यास की कहानी नहीं, बल्कि दिगम्बर जैन मुनिश्री 108 विकौशल सागर जी महाराज के जीवन का सजीव सत्य है।
हरियाणा के अम्बाला में 10 दिसंबर 1981 को जन्मे मुनिश्री का गृहस्थ नाम विनय जैन था। पिता एडवोकेट श्री रामस्वरूप जैन और माता श्रीमती रक्षा जैन से मिले धार्मिक संस्कारों ने बचपन से ही उनके मन में अध्यात्म के बीज बो दिए थे। उन्होंने बी.कॉम. के बाद चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई पूरी की और लगभग नौ वर्षों तक कॉरपोरेट क्षेत्र में सफलता के साथ कार्य किया। जीवन अपनी ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहा था, लेकिन नियति उन्हें किसी और मंजिल की ओर बुला रही थी।
कहते हैं, कभी-कभी एक क्षण पूरे जीवन को बदल देता है। आचार्य श्री 108 विरागसागर जी महाराज के दर्शन ने उनके अंतर्मन में वैराग्य की ऐसी ज्योति प्रज्ज्वलित की कि उन्होंने धन, पद, प्रतिष्ठा और उज्ज्वल भविष्य का मोह त्याग दिया। उन्होंने संसार की दौड़ छोड़ आत्मकल्याण की राह चुन ली।
वर्ष 2012 में प्रतिमा धारण के साथ संयम यात्रा प्रारंभ हुई। 5 मई 2013 को क्षुल्लक दीक्षा और 24 नवंबर 2015 को दिगम्बर मुनि दीक्षा ग्रहण कर वे मुनिश्री विकौशल सागर जी महाराज के नाम से धर्मसंघ में प्रतिष्ठित हुए।
तप की ऐसी साधना, जो विरले ही देखने को मिलती है
मुनिश्री का जीवन त्याग और तपस्या का पर्याय बन चुका है। उन्होंने केवल परिवार और वैभव का ही नहीं, बल्कि स्वाद और सुविधा का भी त्याग किया। 44 प्रकार की हरित सब्जियों सहित अनेक खाद्य पदार्थों का आजीवन परित्याग कर दिया।
वर्ष 2014 से 2022 तक प्रत्येक दशलक्षण महापर्व में लगातार 10-10 दिन के निर्जल उपवास कर उन्होंने कठोर तप का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। वर्ष 2025 में उन्होंने 3 माह 15 दिन की विशेष तप-साधना की, जिसमें 2 माह 15 दिन का मौन, एक समय आहार और छह रसों का त्याग शामिल रहा। आज तक 1400 से अधिक निर्जल उपवास उनकी तपशक्ति की अद्भुत गाथा कह रहे हैं। वर्ष 2016 से वे अपना कमण्डल स्वयं लेकर विहार कर रहे हैं
युवाओं को दे रहे हैं जीवन बदलने का संदेश
मुनिश्री के प्रवचनों का केंद्र केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवन निर्माण है। वे ध्यान, स्वाध्याय, आत्मचिंतन, चरित्र निर्माण और आत्मानुशासन पर विशेष बल देते हैं। उनके सान्निध्य से अनेक युवा नशामुक्ति, सदाचार और भारतीय संस्कारों की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
वे अक्सर कहते हैं— “सबसे बड़ी जीत संसार पर नहीं, स्वयं पर विजय प्राप्त करना है।”
आज जब अधिकांश युवा सफलता को वेतन और पद से मापते हैं, तब मुनिश्री विकौशल सागर जी महाराज का जीवन यह संदेश देता है कि वास्तविक समृद्धि आत्मशांति, संयम और आत्मविजय में निहित है।
वर्तमान में वर्ष 2026 का उनका चातुर्मास उत्तर प्रदेश के ललितपुर जनपद के महरौनी नगर में चल रहा है, जहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनके दर्शन, प्रवचन और तपमय जीवन से प्रेरणा लेने पहुँच रहे हैं।













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