समाचार

इच्छाओं के सफल होने की नहीं बल्कि इच्छाओं के निर्मल होने की प्रार्थना करें – आचार्यश्री अनुभवसागर जी महाराज

लोहारिया(बांसवाड़ा) 24 जुलाई 2020 । ग्रंथ राज्य समयसार की व्याख्या करते हुए पूज्य युवाचार्य श्री अनुभव सागर जी महाराज ने कहा की जरूरतें तो भिखारी की भी पूरी हो जाती हैं इच्छाएं तो चक्रवर्ती की भी पूर्ण नहीं हो पाती । वास्तविकता यही है की जिसके पास जो होता है वह उसमें संतुष्ट नहीं होता । और जो नहीं उसी की इच्छा – अभिलाषा मैं प्राणी दिन रात परिश्रम में लगा रहता है । जरूरतें तो बहुत ही सामान्य मेहनत से पूर्ण हो जाती हैं परंतु और – और प्राप्त करने की अभिलाषा ही हमेशा प्राणी को भटका रही है । किसी शायर ने बहुत मार्मिक बात कही है इंसा की ख्वाहिश हैं कि उड़ने को पर मिले पंछी की चाहते हैं कि रहने को घर मिले । इंसान को घर मिलता है तो वह पर की अर्थात पंखों की चाह लिए भागता रहता है । पक्षी को पंख मिले हैं तो वह आशियाने की तलाश में भाग रहे हैं । जिसे जो मिला है वह उसमें संतुष्ट नहीं है । देखो ना ठंडा की चाहत रखने वाले व्यक्ति को अगर ठंडा ज्यादा हो जाए तो वह गरम की तलाश में लग जाता है । ठंडा हो तो गरम चाहिए और गर्म हो तो ठंडा चाहिए । यानी जो है वह नहीं चाहिए और जो नहीं है वह जरूर चाहिए बस यही इच्छाएं और अभिलाषाएं प्राणी को असंतुष्ट बनाए रखती है । संत कहते हैं कि हम शरीर धारियों का इंद्रिय जन्य सुख स्थाई नहीं है । अज्ञानता के बस हम उन्हीं सुख – दुख से संतप्त हो रहे हैं। आचार्य श्री ने कहा कि हमें प्रभु से यह प्रार्थना नहीं करनी है कि हमारी इच्छायें सफल हो जायें बल्कि अब तो हम यह प्रार्थना करें कि हमारी इच्छायें निर्मल हो जायें । इच्छाओं की निर्मलता हमें सफलता की ओर संतुष्टि तक भी पहुँचा देगी ।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
संपादक

About the author

संपादक

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page