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जानिए किस यक्षिणी की मूर्ति निकली थी नाव से : प्रतिष्ठा करते वक्त हो गया था तपता तवा तुरंत ठंडा


जैन भगवान चन्द्र प्रभु की यक्षिणी हैं आरा वाली ज्वालामालिनी देवी, इनका अतिशय विश्वप्रसिद्ध है। नवरात्र के दिनों में यहां विशेष तौर पर पूजा होती है। पढ़िए यह रिपोर्ट…


आरा। जैन धर्म में 24 तीर्थकर (भगवान) हैं। हर तीर्थंकर के एक-एक यक्ष एवं यक्षिणी होते हैं। इन्हें देव एवं देवी कहा जाता है। ये देव-देवी तप काल में तीर्थकरों पर होने वाले उपसर्गों से उनकी रक्षा तथा उनके कार्यों में सहयोग करते हैं। आरा में जैन भगवान चन्द्र प्रभु की चतुर्मुखी मूर्ति का प्रसिद्ध मंदिर है। मंदिर के साथ ही भगवान की यक्षिणी ज्वालामालिनी देवी का मंदिर भी है।

नाव से निकली थी मूर्ति 

माना जाता है कि विक्रम संवत 1896 (करीब 180 साल पहले) में आरा के बगल से गुजरने वाली गंगा में एक नाव अचानक रुकी। नाव पर कोई मल्लाह नहीं था। नाव पर जैन भगवान चन्द्र प्रभु की चतुर्मुखी मूर्ति तथा उनके यक्ष एवं यक्षिणी विजय देव एवं ज्वालामालिनी देवी की प्रतिमाएं विराजमान थीं। आरा निवासी प्रद्युम्न दास जी की माताजी को माता ज्वालामालिनी जी का स्वप्न आया कि गंगा में एक नाव है जिसपर भगवान की प्रतिमा देवयोग से आयी है।

अगले दिन जब लोग गंगा तट पर पहुंचे और प्रतिमा को शहर में लाने का प्रयास किया गया तो प्रतिमा हल्की हो गयी। प्रतिमा को लाकर नगर के बीच भव्य शिखरबद्ध मन्दिर बनाकर उसमें स्थापित किया गया। इसकी प्रतिष्ठा भट्टारक राजेंद्र भूषण जी के हाथों हुई। प्रतिष्ठा सही हुई है या नहीं इसकी जांच के लिए भट्टारकजी एक तपते लोहे के तवे पर नंगे पांव खड़े हो गए। तब अद्भुत यक्ष एवं यक्षिणी ज्वाला माता के चमत्कार से वह तपता तवा ठंडा हो गया।

नौ दिन तक होती है विशेष पूजा

यहां स्थापित ज्वालामालिनी देवीजी का अतिशय अदभुत है। हर वर्ष नवरात्रि के नौ दिन देवीजी की विशेष पूजा अर्चना की पर गए तो नाव में प्रतिमाएं मिलीं। प्रतिमा जाती है।

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