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गलत समझने वालों को दोष नहीं दें : आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ की छीपी टोला में ग्रीष्मकालीन वाचना


आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ जैन भवन छीपीटोला में विराजमान हैं। जहाँ उनकी ग्रीष्मकालीन वाचना निरंतर चल रही है। आगरा से पढ़िए, यह खबर…


आगरा। आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ससंघ जैन भवन छीपीटोला में विराजमान हैं। जहाँ उनकी ग्रीष्मकालीन वाचना निरंतर चल रही है। इसी दौरान प्रातः काल की सभा में उपदेश देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि जो लोग व्यवहार में बच्चों जैसे सहज और सरल होते हैं, मेहनत करने में हमेशा तत्पर रहते हैं और दूसरों को मार्गदर्शन देने में बुजुर्गों जैसा अनुभव रखते हैं, उनसे हर व्यक्ति रिश्ता बनाना चाहता है और वे हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करते हैं। समझ के विषय में प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जिसके पास जितनी समझ होती है, वह बात को उतना ही समझता है; इसलिए गलत समझने वालों को दोष देने के बजाय हमें स्वयं को समझना चाहिए। उन्होंने सचेत किया कि गलत समझने वालों से ज्यादा खतरनाक धोखा देने वाले लोग होते हैं। अतः आलोचना करने और गलत समझने वालों के सामने हमेशा गंभीरता बनाए रखनी चाहिए। आचार्यश्री ने आलोचना करने वालों की तुलना एक कुशल माली से करते हुए कहा कि वे बाग के माली की तरह होते हैं, जो काट-छाँट करके और खाद-पानी देकर हमारे जीवन रूपी बगीचे को सुंदर आकार और शक्ति प्रदान करते हैं, इसलिए उन्हें शत्रु न मानकर अपना मित्र समझना चाहिए।

स्वयं को ही पैर आगे बढ़ाने होंगे

पुरुषार्थ की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि दूसरों से पूछने पर केवल मार्ग की जानकारी मिल सकती है, लेकिन मंजिल पाने के लिए स्वयं को ही पैर आगे बढ़ाने होंगे। किसी के कहने पर कभी गलत रास्ता नहीं चुनना चाहिए, बल्कि गलत रास्ता बताने वाले को भी सही रास्ते पर लाने का प्रयास करना चाहिए। आध्यात्मिक संदेश देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि मोक्ष मार्ग में बाहर का भौतिक प्रकाश किसी काम नहीं आता, बल्कि वहाँ केवल ज्ञान का प्रकाश ही काम आता है जो मोक्ष के मार्ग को प्रकाशित करता है। उन्होंने सांसारिक सुख-दुख को चंद्रमा की कलाओं की तरह घटता-बढ़ता बताया और कहा कि नकारात्मक सोच वालों को समाज में सभी लोग नकार देते हैं, इसलिए जीवन में हमेशा सकारात्मकता अपनानी चाहिए।

सोच समझकर समाधान निकालना चाहिए

छल कपट वाले दूसरों के धन को डकारते हैं। अतः दोनों से दूर रहना चाहिए। जो वक्त पर काम आते हैं और वक्त पर सही बोलते हैं,जो वक्त की कीमत सम्‌झाते हैं। वही सही वक्ता होते हैं उनके सभी भक्त बन जाते हैं। इंसान को राग द्वेष और मोह के पंख से और कल्पनाओं के पंख से बचना चाहिए, ये दोनों जीवन को बर्बाद करते हैं। समस्याओं में उलझना नहीं चाहिए बल्कि सोच समझकर और शक्ति लगाकर समाधान निकालना चाहिए क्योंकि, समस्याएं सोच समझ और शक्ति प्रदान करती हैं।

चर्चा को चर्या में उतरना ही सही पुरुषार्थ है

गुणानुरागी को गुणी सुहाते है उन्हीं के गुण गाते है इसलिए गुणी कहलाते। हार ना मानने वालों की जीते होती है। हार ना मानने वालों को गले में हार पहनाते हैं। जो जिंदा को रुलाता है और मरे हुए पर रोता है वह सबसे बड़ा अज्ञानी है। प्रत्येक संसारी आत्मा में हुनर और होनहार है। होनहार को बदलने का कार्य स्वयंभू का नहीं है वल्कि स्वयं का है इसलिए होनहार को स्वयंभू नहीं स्वयं बदल सकते हैं। जो होनहार को स्वयं बदल देते हैं वे एक दिन स्वयंभू बन जाते हैं। चर्चा को चर्या में उतरना ही सही पुरुषार्थ है।

मेहनत करने वालों को जिंदगी आसान लगती है

बैरागी को वैराग्य आने पर सुविधा ही दुविधा लगने लगती है। बैरागी ना शिकायत करता है ना साधन ढूंढता है और न दूसरों का साथ ढूंढता है बल्कि साथना में लग जाता है। मेहनत करने वालों को जिंदगी आसान लगती है आलसी पड़े रहने वालों को जीवन उल्पात लगती है उस सुख का प्रदर्शन ना करें जो दूसरों के लिए दुख का कारण बनता है। 6 जुलाई को आचार्य श्री के करकमलों द्वारा पार्वशधाम आगरा में एक दिगम्बरी जैन मुनि दीक्षा होने जा रही है एवं मुनिश्री शिवदत्त सागर जी महाराज को उपाध्याय पद संस्कार किए जाएंगे।

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